JPSC-JSSC रांची: झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब केवल एक परीक्षा रद्द कराने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है।
यह विवाद परीक्षा की निष्पक्षता, आयोगों की जवाबदेही, निजी परीक्षा एजेंसियों की भूमिका,
सरकारी भर्ती में पारदर्शिता और चयनित अभ्यर्थियों के अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।
विवाद की शुरुआत 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा से हुई।
यह परीक्षा 19 अप्रैल 2026 को 103 पदों के लिए आयोजित की गई थी।
परिणाम जारी होने के बाद अभ्यर्थियों ने कट-ऑफ, ओएमआर शीट और परिणाम प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए।
कुछ अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि परिणाम जारी करने की प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी नहीं थी।
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सोशल मीडिया पर एक ओएमआर शीट भी प्रसारित हुई, जिसके आधार पर अनियमितता का दावा किया गया, हालांकि उस शीट की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
JPSC-JSSC विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
रिपोर्टों के अनुसार, अभ्यर्थियों की आपत्तियां मुख्य रूप से चार मुद्दों पर थीं।
पहला, श्रेणीवार कट-ऑफ और विस्तृत अंक सार्वजनिक करने की मांग।
दूसरा, परिणाम-पत्र और आयोग की प्रक्रिया में हस्ताक्षरों से जुड़ा सवाल।
तीसरा, ओएमआर शीट और मूल्यांकन की विश्वसनीयता।
चौथा, इस बात की जांच कि परीक्षा कराने वाली एजेंसी और उससे जुड़े लोगों की पृष्ठभूमि की पर्याप्त जांच हुई थी या नहीं।
इन सवालों के बीच राज्य सरकार ने मामला CID को सौंपा।
जांच के दौरान छापे, पूछताछ और गिरफ्तारियों की खबरें सामने आईं।
कुछ रिपोर्टों में JPSC अधिकारियों, पूर्व पदाधिकारियों और निजी परीक्षा एजेंसी से जुड़े लोगों की भूमिका की जांच का उल्लेख है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि जांच और गिरफ्तारी किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करती।
अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
25 जुलाई से शुरू हुआ छात्र आंदोलन
25 जुलाई 2026 को रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों ने आंदोलन शुरू किया।
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग थी कि 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा रद्द की जाए और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
कई छात्र संगठन CBI जांच या किसी स्वतंत्र समिति से जांच कराने की मांग कर रहे थे।
धीरे-धीरे आंदोलन में JSSC-CGL, पुराने JPSC भर्ती चक्र और अन्य सरकारी परीक्षाओं से जुड़े अभ्यर्थी भी शामिल हो गए।
इस वजह से यह आंदोलन एक परीक्षा के विरोध से आगे बढ़कर झारखंड की भर्ती व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग बन गया।
आंदोलन का नेतृत्व किसी एक संगठन के हाथ में नहीं था।
JPSC-JSSC Abhyarthi Nyay Manch और JPSC-JSSC Reforms Manch जैसे अलग-अलग मंच सक्रिय रहे।
चंदन राजक और रविंद्र पासवान छात्र प्रतिनिधियों के रूप में सामने आए।
देवेंद्र नाथ महतो ने भूख हड़ताल और आंदोलन के बाद के चरण में प्रमुख भूमिका निभाई।
अलग-अलग मंचों की मौजूदगी के कारण छात्रों की मांगें व्यापक रहीं, लेकिन सरकार के साथ बातचीत में एक साझा अंतिम रुख तय करना भी चुनौतीपूर्ण रहा।
सरकार से बातचीत और पहली बड़ी रियायत
अगस्त के पहले सप्ताह में सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई।
6 अगस्त को आंदोलन 13वें दिन में पहुंच गया था और कुछ छात्र भूख हड़ताल पर थे।
छात्रों ने 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल बनाकर सरकार के साथ वार्ता की।
9 अगस्त को सरकार ने 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा सहित तीन परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति जताई।
सरकार ने परीक्षा सुधार समिति, फास्ट-ट्रैक अदालतों, छात्र-फीडबैक पोर्टल और परीक्षा संस्थाओं में vigilance व्यवस्था बनाने जैसे कदमों की भी बात कही।
इसके बावजूद आंदोलन तुरंत समाप्त नहीं हुआ, क्योंकि छात्र JSSC-CGL रद्द करने और CBI जांच की मांग पर कायम रहे।
इसी दौरान JPSC के अध्यक्ष एल. खियांग्ते के इस्तीफे और आयोग के तीनों सदस्यों के इस्तीफे की खबर सामने आई।
इन इस्तीफों से विवाद का संस्थागत प्रभाव और गहरा हो गया।
छात्रों ने इसे आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों की गंभीरता से जोड़कर देखा,
जबकि सरकार के सामने आयोग को फिर से व्यवस्थित करने की चुनौती खड़ी हो गई।
सरकार ने JSSC-CGL और अन्य परीक्षाओं पर क्या फैसला लिया?
17 अगस्त को राज्य कैबिनेट ने JSSC-CGL के परिणाम को रद्द करने और कुछ अन्य भर्ती परीक्षाओं की समीक्षा का फैसला किया।
TDPL नाम की निजी परीक्षा एजेंसी से जुड़ी परीक्षाओं पर भी सवाल उठे।
सरकार ने 2014 के बाद हुई परीक्षाओं में कथित त्रुटियों की व्यापक जांच की बात कही।
18 अगस्त की अधिसूचनाओं के संबंध में प्रकाशित रिपोर्टों में 22 भर्ती परीक्षाओं या प्रक्रियाओं को रद्द करने,
छह को जांच पूरी होने तक रोकने और 17 पुराने JPSC मामलों को CID जांच के लिए भेजने की जानकारी दी गई।
सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए एक समिति बनाने की भी घोषणा की।
इसके अलावा JPSC और JSSC में आंतरिक vigilance cell, मानक संचालन प्रक्रिया और छात्रों की शिकायतों के लिए पोर्टल बनाने की बात कही गई।
फिर विवाद क्यों नहीं खत्म हुआ?
सरकार के रद्दीकरण फैसले से छात्रों की एक बड़ी मांग पूरी हुई,
लेकिन इससे चयनित और नियुक्त अभ्यर्थियों की समस्या सामने आ गई।
जिन अभ्यर्थियों ने परीक्षा पास कर ली थी या नियुक्ति पा ली थी,
उनका कहना था कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो दोषी लोगों पर कार्रवाई की जाए,
लेकिन सभी चयनित अभ्यर्थियों को एक साथ दोषी न माना जाए।
इन अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट का रुख किया। उनका तर्क था कि उन्होंने सरकारी नियमों के अनुसार परीक्षा दी,
परिणाम के आधार पर चयनित हुए और कई मामलों में नियुक्ति भी प्राप्त की।
इसलिए उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई दिए बिना सामूहिक रूप से हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।
यहीं से विवाद दो अलग-अलग पक्षों में बंट गया। एक पक्ष चाहता है कि संदिग्ध परीक्षा रद्द हो और फिर से निष्पक्ष परीक्षा कराई जाए।
दूसरा पक्ष चाहता है कि जांच व्यक्तिगत आधार पर हो और निर्दोष चयनित अभ्यर्थियों की नौकरी सुरक्षित रखी जाए।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
20 अगस्त को झारखंड हाई कोर्ट ने 11वीं से 13वीं JPSC परीक्षाओं से जुड़े 342 अधिकारियों की नियुक्तियां रद्द करने के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई।
रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने प्राकृतिक न्याय और व्यक्तिगत सुनवाई का मुद्दा उठाया तथा पुनर्बहाली और वेतन भुगतान का निर्देश दिया।
21 अगस्त को JSSC-CGL और CDPO भर्ती रद्द करने के सरकारी फैसले पर भी अंतरिम रोक की खबर सामने आई।
अदालत के ये आदेश अंतिम फैसला नहीं हैं। इनका अर्थ यह नहीं है कि परीक्षा में कोई अनियमितता नहीं हुई या सरकार का पूरा फैसला गलत है।
अंतरिम रोक का उद्देश्य अंतिम निर्णय तक प्रभावित अभ्यर्थियों की स्थिति को सुरक्षित रखना और सरकार से निर्णय का आधार स्पष्ट कराना है।
आगे अदालत को यह देखना होगा कि कथित अनियमितता कितनी व्यापक थी,
क्या पूरी परीक्षा प्रक्रिया दूषित हुई थी, किन अभ्यर्थियों के खिलाफ व्यक्तिगत सबूत हैं ?
और किन चयनित अभ्यर्थियों ने ईमानदारी से परीक्षा पास की। इसी आधार पर भविष्य में परीक्षा रद्द करने,
पुनर्परीक्षा कराने या उम्मीदवार-विशिष्ट कार्रवाई का रास्ता तय हो सकता है।
आंदोलन का नया चरण और FIR
सरकारी फैसला आने के बाद आंदोलन का एक चरण समाप्त या स्थगित हुआ।
देवेंद्र नाथ महतो और अन्य छात्रों ने भूख हड़ताल खत्म की, लेकिन CBI जांच
और अन्य भर्ती परीक्षाओं को लेकर असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
PGT भर्ती से जुड़े छात्रों का आंदोलन जारी रहने की भी खबर आई।
21 अगस्त को रांची में प्रदर्शन के दौरान झड़प की खबर सामने आई।
22 अगस्त की रिपोर्टों के अनुसार रांची में तीन FIR दर्ज की गईं,
जिनमें 14 लोगों को नामजद और लगभग 200 अज्ञात लोगों का उल्लेख किया गया।
हजारीबाग में भी लगभग 700 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज होने की खबर है।
पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने निर्धारित मार्ग का उल्लंघन किया, सरकारी काम में बाधा डाली और पुलिस से झड़प की।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें पुलिस तथा कथित राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने पीटा।
विवाद की असली गंभीरता क्या है?
यह मामला गंभीर इसलिए है क्योंकि इसमें केवल परीक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि पूरी भर्ती व्यवस्था पर भरोसा प्रभावित हुआ है।
JPSC अध्यक्ष और सदस्यों के इस्तीफे, जांच, गिरफ्तारियां, सरकार का बड़े पैमाने पर रद्दीकरण फैसला
और हाई कोर्ट की अंतरिम रोक, ये सभी घटनाएं बताती हैं कि विवाद प्रशासनिक स्तर पर गहरा है।
इसका असर हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है, एक ओर वे छात्र हैं जिन्होंने वर्षों तक तैयारी की
और अब पुनर्परीक्षा की आशंका से फिर से तैयारी करने को मजबूर हो सकते हैं।
दूसरी ओर वे चयनित अभ्यर्थी हैं जिनकी नौकरी, वेतन और सामाजिक प्रतिष्ठा पर अनिश्चितता बनी हुई है।
रिपोर्टों में 14वीं JPSC के संदर्भ में 103 पदों और दो हजार से अधिक प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के प्रभावित होने की बात कही गई है।
सरकारी भर्ती में देरी का असर विभागों की कार्यक्षमता पर भी पड़ेगा।
खाली पद लंबे समय तक खाली रह सकते हैं, प्रशासनिक काम प्रभावित हो सकता है और नए भर्ती कैलेंडर में देरी हो सकती है।
साथ ही, यदि परीक्षा सुधारों को लागू नहीं किया गया तो भविष्य में हर नई परीक्षा को संदेह की नजर से देखा जा सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
पहली संभावना यह है कि हाई कोर्ट सरकार के फैसलों की विस्तृत समीक्षा करे और
केवल उन परीक्षाओं या नियुक्तियों पर कार्रवाई हो जिनमें ठोस अनियमितता प्रमाणित होती है।
इससे निर्दोष चयनित अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा हो सकती है, लेकिन जांच में अधिक समय लग सकता है।
दूसरी संभावना यह है कि जिन परीक्षाओं की मूल प्रक्रिया व्यापक रूप से प्रभावित पाई जाए, उनकी पुनर्परीक्षा कराई जाए।
ऐसी स्थिति में सरकार को आयु-सीमा में छूट, परीक्षा शुल्क में राहत, पर्याप्त तैयारी समय और स्पष्ट भर्ती कैलेंडर देना चाहिए।
तीसरी संभावना यह है कि सरकार, छात्र प्रतिनिधियों और चयनित अभ्यर्थियों के बीच कोई मध्यस्थ समाधान निकले।
इसमें दोषी पाए गए व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई, निर्दोष चयनित अभ्यर्थियों की सुरक्षा और
संदिग्ध परीक्षाओं की निष्पक्ष पुनर्परीक्षा शामिल हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि घोषित सुधार वास्तव में लागू होते हैं या नहीं।