संसद के दोनों सदनों से Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 पारित होने के बाद केंद्र और खनिज-समृद्ध राज्यों के बीच पुराना विवाद फिर तेज हो गया है।
प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य राज्यों द्वारा mineral rights और mineral-bearing land पर लगाए जाने वाले अलग-अलग taxes, cesses और levies को नियंत्रित करना है।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ठीक दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्यों के खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की शक्ति को बरकरार रखा था।
अब केंद्र सरकार MMDR कानून में बदलाव के जरिए इस शक्ति के इस्तेमाल पर सीमाएं लगाने की कोशिश कर रही है।
यही वजह है कि यह मामला केवल mining companies के टैक्स का नहीं, बल्कि राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता, संघीय ढांचे, खनन की लागत और देश में mineral prices से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।
पहले समझिए 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था
25 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट की नौ-सदस्यीय Constitution Bench ने 8:1 के बहुमत से महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि mineral royalty अपने आप में tax नहीं है और राज्यों के पास mineral rights पर tax लगाने की legislative power है।
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साथ ही, mineral-bearing lands पर tax लगाने की राज्य की शक्ति को भी स्वीकार किया गया।
इस फैसले ने 1989 के India Cement Ltd. v. State of Tamil Nadu मामले में अपनाए गए पुराने दृष्टिकोण को पलट दिया।
उस फैसले में royalty को tax माना गया था और राज्यों की अलग से mineral taxation की शक्ति को सीमित माना गया था।
2024 के फैसले ने इसलिए खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए अपने प्राकृतिक संसाधनों से अतिरिक्त राजस्व जुटाने का रास्ता खोल दिया।
लेकिन पुराने बकाए का क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में अपने आदेशों के जरिए retrospective mineral-tax demands के भुगतान के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था भी बनाई।
1 अप्रैल 2005 से पहले की अवधि को retrospective tax demands से बाहर रखा गया।
वहीं 1 अप्रैल 2005 के बाद की अवधि से संबंधित वैध tax demands की recovery की अनुमति दी गई।
ऐसे बकाए का भुगतान 1 अप्रैल 2026 से शुरू होकर 12 वर्षों में किया जा सकता है।
साथ ही, 25 जुलाई 2024 से पहले की अवधि से संबंधित इन demands पर interest और penalty लगाने से राहत दी गई।
यानी सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को taxing power तो दी, लेकिन पुराने बकाए की recovery को भी एक staggered framework में रखा।
2024 के फैसले के बाद राज्यों ने क्या किया?
फैसले के बाद कुछ खनिज-समृद्ध राज्यों ने mineral-based levies लागू करने या प्रस्तावित करने की दिशा में कदम उठाए।
झारखंड
झारखंड ने Mineral-Bearing Land Cess लागू किया।
राज्य में लौह अयस्क पर इसकी मौजूदा दर ₹400 प्रति टन है।
खनिज राजस्व झारखंड की वित्तीय व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
राज्य के Economic Survey के अनुसार, 2024-25 में mining receipts उसकी Own Non-Tax Revenue का 84.9% थीं।
इसीलिए झारखंड सरकार इस मुद्दे को केवल mining policy नहीं, बल्कि राज्य की वित्तीय क्षमता से जुड़ा विषय मान रही है।
तमिलनाडु
तमिलनाडु ने limestone पर ₹160 प्रति टन Mineral-Bearing Land Tax लगाया।
इसका सीधा प्रभाव cement industry पर पड़ता है क्योंकि limestone cement manufacturing का प्रमुख raw material है।
कर्नाटक
कर्नाटक ने भी mineral taxation के क्षेत्र में इसी तरह के कदम का प्रस्ताव रखा है, खासकर non-auction iron ore leases को लेकर।
इससे स्पष्ट है कि 2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद राज्यों ने mineral taxation को एक नए revenue source के रूप में देखना शुरू किया।
अब केंद्र सरकार क्यों हस्तक्षेप कर रही है?
केंद्र सरकार की मुख्य चिंता यह है कि अगर हर राज्य mineral rights और mineral-bearing land पर अलग-अलग और लगातार बढ़ते हुए taxes और cesses लगाता है,
तो mining companies पर cumulative financial burden बहुत बढ़ सकता है।
Mining companies पहले से ही कई तरह के भुगतान करती हैं।
इनमें:
- royalty,
- District Mineral Foundation यानी DMF contribution,
- National Mineral Exploration and Development Trust यानी NMET contribution,
- environmental और pollution-related charges
जैसे भुगतान शामिल हैं।
केंद्र का तर्क है कि इनके ऊपर अलग-अलग राज्यों की अतिरिक्त levies बढ़ने से mineral production की लागत बढ़ सकती है।
इसका असर केवल mining companies तक सीमित नहीं रहेगा।
Iron ore, limestone और coal जैसे minerals कई downstream industries के लिए raw materials हैं।
इसलिए mining cost बढ़ने का असर steel, cement, infrastructure और construction जैसी industries पर भी पड़ सकता है।
यही कारण है कि केंद्र एक अधिक predictable और uniform fiscal framework की बात कर रहा है।
MMDR Bill 2026 क्या बदलना चाहता है?
संशोधन विधेयक का मूल उद्देश्य राज्यों द्वारा mineral rights और mineral-bearing land पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त taxes, cesses और levies को नियंत्रित करना है।
केंद्र की ओर से यह तर्क दिया गया है कि mineral sector में अलग-अलग प्रकार की लगभग 14 levies मौजूद हैं और समस्या किसी एक levy की नहीं, बल्कि इन सभी के cumulative burden की है।
सरकार ऐसे framework की दिशा में बढ़ रही है जिसमें अलग-अलग levies जारी रह सकती हैं, लेकिन उनका कुल बोझ एक तय सीमा से अधिक न हो।
हालांकि, इस सीमा का अंतिम प्रतिशत अभी तय नहीं हुआ है और इसे राज्यों के साथ consultation के बाद तय किए जाने की बात कही गई है।
इसलिए इसे अभी final percentage cap के रूप में नहीं, बल्कि प्रस्तावित regulatory framework के रूप में समझना चाहिए।
राज्यों की सबसे बड़ी आपत्ति क्या है?
राज्यों का कहना है कि mineral resources उनके क्षेत्र में मौजूद हैं और उन संसाधनों से पैदा होने वाले environmental तथा social costs का बड़ा हिस्सा भी राज्य ही उठाते हैं।
Mining से जुड़े infrastructure, विस्थापन, पर्यावरणीय दबाव और स्थानीय विकास की जरूरतों के लिए राज्यों को अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
झारखंड इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
13 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर MMDR amendments पर चिंता जताई।
उनके अनुसार, 2024-25 में mining revenue राज्य की Own Non-Tax Revenue का लगभग 84.9% था।
उन्होंने यह भी कहा कि Mineral-Bearing Land Cess से लगभग ₹11,000 करोड़ सालाना राजस्व मिलने की उम्मीद थी।
इसलिए राज्य सरकार की चिंता यह है कि अगर mineral-based levies पर बड़ी सीमा लगा दी जाती है,
तो राज्य के पास अपने खनिज संसाधनों से revenue जुटाने की क्षमता कम हो सकती है।
असली विवाद: revenue बनाम cost?
पूरे विवाद को केवल “केंद्र बनाम राज्य” या “industry बनाम government” के रूप में देखना अधूरा होगा।
असल में तीन अलग-अलग हित टकरा रहे हैं।
पहला – राज्यों का revenue interest।
Mineral-rich states चाहते हैं कि उन्हें अपने संसाधनों से पर्याप्त revenue जुटाने की स्वतंत्रता मिले।
दूसरा – mining industry की cost certainty।
Mining companies चाहती हैं कि उन्हें पहले से पता हो कि किसी mineral को निकालने पर कुल statutory burden कितना होगा।
अगर अलग-अलग राज्यों में लगातार नई levies आती रहें, तो long-term investment decisions मुश्किल हो सकते हैं।
तीसरा – राष्ट्रीय स्तर पर mineral prices और supply।
केंद्र का तर्क है कि अत्यधिक state-level levies से minerals महंगे हो सकते हैं और इसका असर downstream industries तथा infrastructure projects की लागत पर पड़ सकता है।
यानी सवाल यह है कि राज्यों को कितना taxing space मिले और mining industry पर कितना cumulative burden स्वीकार्य हो।
क्या राज्यों को बड़ा revenue loss होगा?
इसका जवाब अभी निश्चित रूप से नहीं दिया जा सकता।
एक ओर, झारखंड जैसे राज्यों के लिए mineral revenue अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, industry representatives का तर्क है कि कुछ state levies लंबे समय से litigation में रही हैं और उनके बड़े हिस्से की recovery पहले से निश्चित नहीं थी।
इसलिए “राज्यों को निश्चित रूप से इतने हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा” जैसी कोई एक consolidated संख्या अभी सावधानी के बिना नहीं दी जानी चाहिए।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि projected revenue और actual collected revenue अलग चीजें हैं।
उदाहरण के लिए,
झारखंड में Mineral-Bearing Land Cess से लगभग ₹11,000 करोड़ annual revenue की उम्मीद बताई गई थी।
इसे सीधे राज्य द्वारा हर साल वसूल की जाने वाली confirmed रकम नहीं माना जाना चाहिए।
मामला इतना संवैधानिक क्यों है?
यहीं से विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।
2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की mineral taxation power को मान्यता दी थी।
अब Parliament MMDR Act में बदलाव करके उस taxing power के exercise को नियंत्रित करना चाहती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि Parliament ने सीधे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “रद्द” कर दिया है।
असली संवैधानिक सवाल यह है कि:
क्या Parliament, MMDR Act जैसे केंद्रीय कानून के जरिए उस taxing power के इस्तेमाल पर ऐसी सीमाएं लगा सकती है,
जिन्हें राज्य अपनी constitutional legislative competence का हिस्सा मानते हैं?
यही प्रश्न आगे चलकर federalism और legislative competence की बहस को जन्म दे सकता है।
इसलिए यह केवल एक mining-sector reform नहीं है।
इसके पीछे भारत के fiscal federalism का बड़ा सवाल है।
उद्योग को क्या फायदा हो सकता है?
अगर सरकार एक स्पष्ट और predictable framework बनाती है, तो mining companies के लिए uncertainty कम हो सकती है।
किसी mining project में investment का निर्णय कई दशकों के horizon पर लिया जाता है।
ऐसे में royalty के अलावा अलग-अलग state levies में बार-बार बदलाव project economics को प्रभावित कर सकते हैं।
एक uniform cumulative framework से कंपनियों को:
- long-term cost planning,
- investment decisions,
- project valuation और
- mineral pricing
में अधिक certainty मिल सकती है।
लेकिन यह तभी संभव है जब proposed ceiling व्यावहारिक हो और राज्यों की वास्तविक fiscal requirements को भी ध्यान में रखे।
राज्यों के लिए खतरा क्या है?
राज्यों की चिंता केवल tax collection तक सीमित नहीं है।
Mineral-rich states में mining revenue का इस्तेमाल infrastructure, welfare और स्थानीय विकास से जुड़े खर्चों के लिए किया जाता है।
अगर राज्य mineral resources पर अतिरिक्त revenue जुटाने की क्षमता खो देते हैं,
तो उन्हें अन्य revenue sources या केंद्र से transfers पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।
इससे भारत के fiscal federalism में केंद्र की भूमिका और मजबूत हो सकती है।
यही वजह है कि राज्य सरकारें इसे अपने fiscal autonomy के मुद्दे के रूप में देख रही हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल तीन हैं।
पहला, cumulative mineral levy की अंतिम सीमा कितनी तय होती है ?
दूसरा, उस सीमा को तय करते समय राज्यों के साथ consultation कितना प्रभावी होता है ?
तीसरा, क्या proposed restrictions को राज्यों की ओर से constitutional challenge किया जाता है ?
इस पूरे विवाद में 2024 का Supreme Court judgment महत्वपूर्ण reference point रहेगा।
क्योंकि एक तरफ कोर्ट ने राज्यों की mineral taxation power को स्वीकार किया है, जबकि दूसरी तरफ
केंद्र अब national mineral market, investment certainty और cost control के नाम पर उस power के exercise को regulate करना चाहता है।
अंत में –
MMDR Amendment Bill 2026 की कहानी मूल रूप से खनिजों पर टैक्स कौन लगाए और कितना लगाए, इस सवाल से शुरू होती है, लेकिन इसका असर इससे कहीं व्यापक है।
2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राज्यों के लिए mineral taxation का रास्ता खोला।
झारखंड और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने इसका इस्तेमाल करना शुरू किया, जबकि कर्नाटक ने भी ऐसे कदम प्रस्तावित किए।
अब केंद्र सरकार इस बढ़ते हुए state-level taxation को एक common framework और cumulative burden की सीमा के जरिए नियंत्रित करना चाहती है।
केंद्र के लिए प्राथमिकता है – खनन की लागत और निवेश में certainty तथा राष्ट्रीय mineral market की uniformity।
राज्यों के लिए प्राथमिकता है – अपने प्राकृतिक संसाधनों से पर्याप्त revenue जुटाने की constitutional और fiscal autonomy।
और mining industry के लिए प्राथमिकता है – tax और regulatory burden में predictability।
इसलिए आने वाले समय में असली सवाल यह नहीं होगा कि केंद्र जीता या राज्य।
असली सवाल यह होगा कि क्या ऐसा संतुलन बनाया जा सकता है जिसमें mining industry पर अनिश्चित और अत्यधिक financial burden न पड़े, लेकिन mineral-rich states को उनके प्राकृतिक संसाधनों और उनसे पैदा होने वाले environmental-social costs के अनुरूप पर्याप्त fiscal space भी मिलता रहे।
यही MMDR Amendment Bill 2026 की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।