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‘प्रस्थान’ के पीछे की रणनीति: हिंद महासागर में भारत क्यों सतर्क है?

18 October 2026
KharunTimes

भारतीय नौसेना का अभ्यास ‘प्रस्थान’ केवल तटीय तैयारी का प्रदर्शन नहीं है , यह हिंद महासागर में बदलते खतरों के प्रति भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया है। आज समुद्री सुरक्षा का सवाल सिर्फ युद्धपोतों और सीमाओं का नहीं रहा , यह ऊर्जा, व्यापार, तकनीक, जलवायु और तटीय जनजीवन से जुड़ा बहुस्तरीय मुद्दा बन चुका है।

खतरे का नया चेहरापहले समुद्री खतरे का मतलब अधिकतर घुसपैठ, तस्करी या समुद्री डकैती था। अब खतरे की सीमाएँ धुंधली हो गई हैं: राज्य और गैर-राज्य शक्तियाँ, पारंपरिक सैन्य दबाव और साइबर-ड्रोन जैसी नई तकनीकें, तथा व्यापार-ऊर्जा निर्भरता एक ही तंत्र में आपस में जुड़ गए हैं।

इसका मतलब यह है कि एक अपतटीय तेल प्लेटफॉर्म पर हमला, बंदरगाह का साइबर अटैक, या व्यस्त जलमार्ग में ड्रोन से हमला इनमें से कोई भी घटना राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ आर्थिक स्थिरता को भी चुनौती दे सकती है।

इसीलिए ‘प्रस्थान’ जैसे अभ्यासों में आग, तेल रिसाव, विस्फोट, बचाव और आतंकी घुसपैठ जैसी परिस्थितियों को एक साथ परखा जाता है।

क्या है ‘प्रस्थान’ ?

‘प्रस्थान’ भारतीय नौसेना का अपतटीय सुरक्षा अभ्यास है, जो हर छह महीने में आयोजित किया जाता है। इसका उद्देश्य नौसेना, तटरक्षक बल, राज्य समुद्री पुलिस, मत्स्य विभाग, बंदरगाह प्रशासन और ऊर्जा कंपनियों जैसे सभी समुद्री हितधारकों की कार्यप्रणाली को एक साथ जोड़ना है।

हाल के आयोजनों में यह अभ्यास मुंबई तट के पास ओएनजीसी के आर-12ए (रत्ना) प्लेटफॉर्म पर भी हुआ, जो मुंबई बंदरगाह से लगभग 83 किलोमीटर दूर स्थित है। इसके पहले पूर्वी नौसेना कमान के तत्वावधान में कृष्णा-गोदावरी बेसिन के अपतटीय विकास क्षेत्र में भी ‘प्रस्थान’ आयोजित हो चुका है।

अभ्यास में क्या परखा गया?

अभ्यास का केंद्र बिंदु था – यदि समुद्र में स्थित तेल और गैस प्लेटफॉर्म पर कोई बड़ी आपदा या हमला हो, तो कितनी तेजी और समन्वय से प्रतिक्रिया दी जा सकती है।

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इसमें आतंकी घुसपैठ, बम विस्फोट, बड़ी आग, तेल रिसाव, घायलों को निकालना, समुद्र में गिरे व्यक्ति की खोज, खोज-बचाव और सामूहिक निकासी जैसी परिस्थितियों का अभ्यास किया गया।

नौसेना के नेतृत्व में ओएनजीसी, रिलायंस इंडस्ट्रीज और वेदांता जैसी ऊर्जा कंपनियों के साथ तटरक्षक बल, आंध्र प्रदेश समुद्री पुलिस और मत्स्य विभाग ने भी हिस्सा लिया।

अभ्यास के बाद मानक संचालन प्रक्रियाओं यानी SOPs को और सुधारने की कोशिश की गई, ताकि असली संकट में फैसले देर से न हों।

रणनीतिक संदेश: समुद्र अब केवल व्यापार का रास्ता नहीं

भारत की 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा, बड़े बंदरगाह, अपतटीय ऊर्जा संपदा और व्यस्त व्यापार मार्ग इसे समुद्री सुरक्षा के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं।

हिंद महासागर में समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध अनियमित तथा अरिपोर्टेड मछली पकड़ना, साइबर-संचालित खतरे और क्षेत्रीय तनाव के बीच भारत के लिए अपनी समुद्री सीमाओं को मजबूत करना रणनीतिक जरूरत बन चुका है।

‘प्रस्थान’ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि भारत अब समुद्र को केवल रक्षा का मोर्चा नहीं, बल्कि ऊर्जा, व्यापार, संचार और आर्थिक सुरक्षा का एक जुड़ा हुआ तंत्र मान रहा है।

अपतटीय प्लेटफॉर्म पर हमला या दुर्घटना सिर्फ एक सुरक्षा घटना नहीं होगी; वह ऊर्जा आपूर्ति, बीमा, निवेश और तटीय अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है।

हिंद महासागर क्यों केंद्र में है?

हिंद महासागर भारत के लिए केवल पड़ोसी समुद्र नहीं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार की धमनी है। भारत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल, यूरिया, एलपीजी और एलएनजी आयात पर निर्भर है, और इनका प्रवाह समुद्री जलमार्गों तथा संकीर्ण रास्तों चोकपॉइंट्स से गुजरता है।

चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, हिंद महासागर तटीय देशों में बंदरगाह निवेश और पाकिस्तान समेत पड़ोसी देशों को सैन्य सहायता भारत के लिए रणनीतिक चिंता बढ़ा रही है। चिंता यह है कि यह प्रभाव क्षेत्र के संतुलन को बदल सकता है और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर भारत की पहुँच को सीमित कर सकता है।

तकनीक ने खेल बदल दिया

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सस्ते ड्रोन, साइबर हमले और असममित तकनीकें महंगे रक्षा तंत्र को चुनौती दे सकती हैं। हाल के संघर्षों ने दिखाया है कि कम लागत वाला ड्रोन भी बड़े बुनियादी ढांचे और सैन्य संपत्ति के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

इसका जवाब केवल अधिक जहाज खरीदना नहीं है। भारत को उपग्रह-आधारित निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर खुफिया, अवमानवित वाहन और सुरक्षित संचार को एक एकीकृत समुद्री जागरूकता तंत्र में जोड़ना होगा। इसका उद्देश्य है खतरे को तट पर पहुँचने से पहले पहचानना और उस पर तेजी से प्रतिक्रिया देना।

मछुआरे: सुरक्षा के पहले सेंसर

तटीय सुरक्षा में मछुआरे अक्सर पीछे छूट जाते हैं, जबकि वे समुद्र की हलचल के सबसे नजदीकी गवाह होते हैं। उनकी नावें, संचार उपकरण और स्थानीय जानकारी समुद्री जागरूकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

लेकिन निगरानी का विस्तार तभी न्यायसंगत होगा जब वह मछुआरों की आजीविका की रक्षा करे। उन्हें मौसम और खतरे की समय पर चेतावनी, बचाव व्यवस्था, पहचान प्रणाली और अवैध गतिविधियों से सुरक्षा चाहिए न कि केवल नियंत्रण।

भारत के लिए असली परीक्षा –

भारत की चुनौती यह है कि वह समुद्री सुरक्षा को एक ओर तो सैन्य ताकत से जोड़े, दूसरी ओर उसे लोकतांत्रिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से स्थायी बनाए। इसके लिए तीन बातें तय करनी होंगी:

तकनीकी आत्मनिर्भरता: ड्रोन, सर्विलांस, साइबर सुरक्षा और समुद्री संचार में स्वदेशी क्षमता।

संस्थागत समन्वय: नौसेना, तटरक्षक, राज्य पुलिस, बंदरगाह, मत्स्य विभाग और ऊर्जा कंपनियों के बीच वास्तविक समय में सूचना साझा करना।

क्षेत्रीय साझेदारी: अवैध मछली पकड़ने, तस्करी, समुद्री डकैती और आपदा प्रबंधन में पड़ोसी देशों के साथ सहयोग, ताकि सुरक्षा केवल दबाव नहीं बल्कि साझा जिम्मेदारी बने।

‘प्रस्थान’ इस बात का संकेत है कि भारत समुद्र को अब केवल रक्षा क्षेत्र नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक और रणनीतिक संवेदनशीलता का केंद्र मान रहा है।

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Laxya Sahu
About the author

Laxya Sahu

लक्ष्य साहू मूलतः नया रायपुर के अभनपुर के निवासी हैं। वे खारुन टाइम्स के प्रधान संपादक हैं तथा सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन करते हैं । उनकी कृति "चार समाज की बात" समकालीन सामाजिक सरोकारों पर आधारित है । छात्र जीवन से ही वे सामाजिक एवं छात्र हित के मुद्दों से जुड़े रहे हैं , इस दौरान उन्होंने अनेक छात्र एवं जनहित संबंधी आंदोलनों को खड़ा कर उनका नेतृत्व किया तथा लगभग आठ वर्षों तक विद्यार्थियों के विकास के उद्देश्य से शैक्षणिक, सामाजिक और नेतृत्व विकास कार्यक्रमों का आयोजन एवं संचालन किया। वर्तमान में वे पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर नियमित कार्य कर रहे हैं।

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