रायगढ़ : करमागढ़ स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा निभाई गई। इस दौरान करीब 50 से 60 बकरों की बलि दी गई। । स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह आयोजन करीब 500 साल से चला आ रहा है।
मां मानकेश्वरी देवी का यह मंदिर रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी के रूप में प्रसिद्ध है। शरद पूर्णिमा पर आयोजित होने वाली विशेष बल पूजा में छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों के साथ पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मन्नत पूरी होने पर बकरा चढ़ाते हैं श्रद्धालु
मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि मां मानकेश्वरी देवी के दरबार में मांगी गई मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बकरा चढ़ाते हैं। संतान प्राप्ति, बीमारी से मुक्ति और अन्य मनोकामनाओं के लिए लोग देवी की आराधना करते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा में शामिल होते हैं।
इस वर्ष भी शरद पूर्णिमा के अवसर पर बड़ी संख्या में लोग करमागढ़ पहुंचे। पूजा के दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान किए गए और उसके बाद बल पूजा की परंपरा निभाई गई।
बल पूजा से एक रात पहले होती है निशा पूजा
इस धार्मिक आयोजन में निशा पूजा का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार, बल पूजा से एक रात पहले मंदिर में विशेष अनुष्ठान किया जाता है। इस दौरान रायगढ़ राजपरिवार की ओर से गांव के बैगा को नवरत्न की अंगूठी पहनाई जाती है।
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स्थानीय मान्यता के मुताबिक, सामान्य दिनों में अंगूठी ढीली रहती है, लेकिन बल पूजा के दिन बैगा के अंगूठे में कस जाती है। श्रद्धालु इसे देवी की उपस्थिति से जोड़कर देखते हैं।
बैगा के शरीर में देवी के वास की मान्यता

मंदिर समिति के सदस्यों के अनुसार, बल पूजा के दौरान बैगा के शरीर में देवी का वास होने की मान्यता है। इसी विश्वास के तहत पूजा की परंपरा के दौरान बैगा बलि दिए गए बकरों का खून ग्रहण करते हैं। श्रद्धालु उनके पैर धोकर और सिर पर दूध डालकर पारंपरिक तरीके से पूजा करते हैं।
कभी 100 से 120 तक पहुंच जाती है बलि की संख्या
मानकेश्वरी मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव के अनुसार, यह परंपरा लगभग पांच शताब्दियों से चली आ रही है। उनके मुताबिक, इस वर्ष करीब 50 से 60 बकरों की बलि दी गई, जबकि कुछ वर्षों में यह संख्या 100 से 120 तक पहुंच जाती है।
श्रद्धालुओं की भीड़ को व्यवस्थित रखने के लिए मंदिर परिसर में बैरिकेडिंग की गई थी। इससे पूजा स्थल पर प्रवेश को नियंत्रित करने और आयोजन की व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिली।
रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी हैं मां मानकेश्वरी
मां मानकेश्वरी देवी को रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी माना जाता है। राज्यसभा सांसद और रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार, देवी की पूजा की यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। क्षेत्र के लोगों की देवी के प्रति गहरी आस्था है और आज भी पुरानी परंपराओं का पालन किया जाता है।
करमागढ़ स्थित मंदिर धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। शरद पूर्णिमा पर यहां होने वाला आयोजन आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।
आस्था और परंपरा के केंद्र में है आयोजन
हर साल शरद पूर्णिमा पर होने वाली बल पूजा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दौरान करमागढ़ और आसपास के इलाकों में मेले जैसा माहौल रहता है। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं और मनोकामना पूरी होने पर पारंपरिक रीति-रिवाज निभाते हैं।
मां मानकेश्वरी मंदिर की यह परंपरा स्थानीय लोकविश्वास, राजपरिवार के इतिहास और आदिवासी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है।