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“विरोध देशद्रोह है या लोकतंत्र की आवाज़?” – सरसंघचालक मोहन भागवत

21 October 2026
KharunTimes

20 अक्टूबर 2026 को नागपुर में आरएसएस के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक मोहन भागवत का उद्बोधन एक साधारण दशहरा-संबोधन से कहीं आगे था।

उन्होंने राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आत्मबोध, युवा पीढ़ी, तकनीक और विदेशी प्रभाव के खतरों पर बात की। साथ ही उन्होंने सत्ता-परिवर्तन की मांग करने वाले आंदोलनों पर सावधानी बरतने की बात कही।

यह भाषण उस समय आया जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। इसलिए इसे केवल धार्मिक-सांस्कृतिक अवसर का भाषण नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में दिया गया एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संदेश माना जा रहा है।

भागवत का मूल संदेश

भागवत के भाषण का केंद्रीय विचार था कि भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति है। उन्होंने कहा कि भारत में पंथ, प्रांत, भाषा, जाति, खान-पान और रीति-रिवाज की विविधता है, लेकिन इन सबको “भारतीयता” के भाव में बांधा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत जब भी बंटा, कमजोर हुआ , इसलिए राष्ट्र को एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए।

उन्होंने “हिंदू भाव” को एक व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें सेवा, समानता, सद्भाव और विश्व-कल्याण का भाव शामिल है। संघ-निकट मीडिया ने इसे संघ के शताब्दी वर्ष का सकारात्मक राष्ट्रीय संदेश माना, जिसमें सनातन दृष्टि और सामाजिक एकता पर बल दिया गया।

विरोध पर उनकी चेतावनी

भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश के प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ वैश्विक शक्तियां देशों को अस्थिर करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने इसे “पश्चिम से आ रहा तूफान” कहा, जो संस्कृति, व्यवस्था और सुरक्षा को निशाना बनाता है।

उनका तर्क था कि सत्ता बदलने से मौलिक समस्याएं हल नहीं होतीं, समाधान समाज के भीतर से आना चाहिए।

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यह चेतावनी कई दृष्टियों से समझी जा सकती है। समर्थकों के अनुसार यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और संस्थागत स्थिरता के लिए आवश्यक सजगता है। उनका कहना है कि आंदोलन तब तक लोकतांत्रिक अधिकार है, जब तक वह संविधान, कानून और नागरिक शिष्टाचार की सीमा में रहे। भागवत ने स्वयं यही कहा कि भावनाएं चाहे कितनी भी प्रबल हों, कार्य संवैधानिक और कानूनी सीमा में होने चाहिए।

दूसरी ओर, विपक्ष और कुछ विश्लेषकों का कहना है कि विरोध को विदेशी साजिश से जोड़ना नागरिक असंतोष के वास्तविक कारणों से ध्यान हटा सकता है। उनका तर्क है कि चुनावी पारदर्शिता, भ्रष्टाचार, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, षड्यंत्र नहीं।

दोनों पक्षों की मजबूती

भागवत की बात में एक वैध चिंता है कि आज के डिजिटल युग में भ्रामक जानकारी, ध्रुवीकरण और बाहरी हस्तक्षेप की आशंका बढ़ी है। सोशल मीडिया और एआई के दौर में जानकारी तेजी से फैलती है, पर उसकी पुष्टि और संदर्भ समझना उतना आसान नहीं रहता।

इसलिए युवाओं से विवेक, संयम और राष्ट्रीय हित के प्रति जागरूकता की अपील को केवल राजनीतिक षड्यंत्र सिद्ध करके खारिज नहीं किया जा सकता।

उसी तरह, विपक्ष की चिंता भी बेबुनियाद नहीं है। लोकतंत्र में विरोध केवल अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही का एक जरिया है। अगर हर आंदोलन को “रिजीम चेंज” या “विदेशी प्रोत्साहन” कह दिया जाए, तो नागरिकों का भरोसा संस्थाओं से कम हो सकता है। इसलिए एकता का आह्वान तभी प्रभावी होता है जब उसके साथ सुनने, संवाद करने और समस्याओं का समाधान करने की प्रक्रिया भी हो।

मीडिया ने कैसे पढ़ा?

बड़े मीडिया संस्थानों ने इस भाषण को अलग-अलग नजरिए से देखा। Indian Express ने इसे विदेशी षड्यंत्र के आरोप, आंदोलनों से सावधानी और एकता के आह्वान के रूप में प्रस्तुत किया। The Week ने फ्रांस और अल्बानिया के प्रदर्शनों से तुलना कर “पश्चिमी ताकतों” के दावे पर ध्यान दिया। The Quint ने इसे दिल्ली के चल रहे प्रदर्शनों के संदर्भ में दिया गया संदेश माना।

वहीं BBC हिंदी ने भाषण के समय और उसके राजनीतिक संदर्भ पर ध्यान दिया, जबकि NDTV , Aaj Tak और ABP ने मुख्य रूप से एकता, युवा, एआई, नशा और विविधता जैसे बिंदुओं को उजागर किया। पांचजन्य ने इसे “हिंदू भाव” और सनातन दृष्टि के सकारात्मक संदेश के रूप में प्रस्तुत किया।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाषण की सराहना की और संघ की सौ वर्षों की सेवा-यात्रा को रेखांकित किया। भाजपा-समर्थक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता और विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ सजगता का आह्वान मानता है।

विपक्ष ने इसे बिना नाम लिए उन लोगों पर निशाना माना जो भारत में सत्ता-परिवर्तन की बात कर रहे हैं। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में सत्ता-परिवर्तन चुनावों के जरिए होता है, और नागरिक असंतोष को दबाने के बजाय उसके कारणों का उत्तर देना जरूरी है।

असली परीक्षा

भागवत का उद्बोधन दो सच्चाइयों को एक साथ रखता है: एक ओर राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक आत्मबोध की आवश्यकता, दूसरी ओर विरोध और असहमति की लोकतांत्रिक भूमिका। दोनों ही चिंताएं वाजिब हैं। सवाल यह नहीं कि कौन सा पक्ष पूरी तरह सही है सवाल यह है कि देश इन दोनों को कैसे साथ रख सकता है।

राष्ट्र तब मजबूत होता है जब वह विरोध को सुनता है, पर उसे हिंसा और अराजकता में बदलने की इजाजत नहीं देता। वह तब भी मजबूत होता है जब सत्ता आलोचना को “दुश्मनी” नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज मानती है। भागवत का संदेश इसी संतुलन की परीक्षा में खड़ा है और यही इस उद्बोधन को आगे की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण बनाता है।

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Laxya Sahu
About the author

Laxya Sahu

लक्ष्य साहू मूलतः नया रायपुर के अभनपुर के निवासी हैं। वे खारुन टाइम्स के प्रधान संपादक हैं तथा सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन करते हैं । उनकी कृति "चार समाज की बात" समकालीन सामाजिक सरोकारों पर आधारित है । छात्र जीवन से ही वे सामाजिक एवं छात्र हित के मुद्दों से जुड़े रहे हैं , इस दौरान उन्होंने अनेक छात्र एवं जनहित संबंधी आंदोलनों को खड़ा कर उनका नेतृत्व किया तथा लगभग आठ वर्षों तक विद्यार्थियों के विकास के उद्देश्य से शैक्षणिक, सामाजिक और नेतृत्व विकास कार्यक्रमों का आयोजन एवं संचालन किया। वर्तमान में वे पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर नियमित कार्य कर रहे हैं।

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