कभी कॉलेज का मतलब पढ़ाई के साथ सिर्फ किताबें, कक्षाएँ और परीक्षाएँ हुआ करता था। आज कई छात्र सुबह लेक्चर में बैठते हैं और शाम को ट्यूशन पढ़ाते हैं, फ्रीलांस प्रोजेक्ट करते हैं या डिलीवरी ऐप पर काम करते हैं। पिछले पाँच वर्षों में यह चलन तेज़ी से बढ़ा है।
डेलॉइट के भारत-केंद्रित सर्वेक्षण के मुताबिक करीब 26% भारतीय Gen Z पहले से पढ़ाई के साथ काम कर रहे हैं। PLFS के अप्रैल 2025 के आँकड़ों में शहरी छात्रों के बीच अंशकालिक काम में तेज़ उछाल दिखा। विशेषज्ञ इसे सिर्फ कौशल-निर्माण नहीं, बल्कि मुख्यतः आर्थिक ज़रूरत से जोड़कर देखते हैं।
आखिर क्यों बढ़ रही है यह प्रवृत्ति?
काम करने और पैसे कमाने की जरूरत को इन कारणों के आधार पर समझा जा सकता है –
पहला कारण पढ़ाई का आर्थिक दबाव है:
पढ़ाई, किराया, लैपटॉप-इंटरनेट और रोज़मर्रा के खर्च बढ़े हैं, इसलिए कई छात्र अपना बोझ खुद उठाना चाहते हैं या परिवार की आय में हाथ बँटाना चाहते हैं। एक छोटे पैमाने के 2024–25 सर्वेक्षण में 55.6% छात्रों ने आर्थिक जरूरत को सबसे बड़ा कारण बताया। अनुभव (17.8%) और माता-पिता पर निर्भरता घटाना (15.6%) उसके बाद आए।
दूसरा कारण नौकरियों के लिए कड़ी आपसी प्रतिस्पर्धा है:
यहाँ संख्याएँ खुद कहानी कहती हैं। द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार एक सरकारी पद के लिए औसतन करीब 170 आवेदक होते हैं, और स्नातकों में बेरोज़गारी दर 22.7% है। महाराष्ट्र की एक पुलिस भर्ती में 17,471 पदों के लिए 17.76 लाख से ज़्यादा आवेदन आए थे।
जब लाखों समान डिग्रीधारी सीमित अवसरों के लिए कतार में हों, तो अकेली डिग्री भीड़ से अलग नहीं करती। इसलिए छात्र पढ़ाई के दौरान ही इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट और काम का अनुभव जोड़कर अपनी दावेदारी मज़बूत करने लगते हैं।
तीसरा कारण रिज़्यूमे की होड़ है:
India Skills Report 2026 के मुताबिक लगभग 92.8% छात्र इंटर्नशिप या व्यावहारिक अनुभव चाहते हैं। IIT बॉम्बे के एक छात्र-लेख में बताया गया है कि साथियों को इंटर्नशिप पाते देख “पीछे छूट जाने का डर” पनपता है और रिज़्यूमे-केंद्रित सोच घर कर लेती है।
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Aditya Birla Education Trust के सर्वेक्षण में 67% छात्रों ने माना कि पढ़ाई, करियर और प्रतिस्पर्धा का दबाव उन पर है। यानी काम करना कई बार ज़रूरत से ज़्यादा “पीछे न रह जाने” की मजबूरी भी बन जाता है।
चौथा कारण शिक्षा और रोज़गार का बेमेल है:
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार केवल 8.25% स्नातक अपनी योग्यता के अनुरूप काम कर रहे थे, और 2021 में लगभग 8.7 करोड़ युवा न पढ़ाई में थे, न काम में, न प्रशिक्षण में।
State of Working India 2026 में यह आँकड़ा करीब 9.2 करोड़ आँका गया है, और 25 वर्ष के स्नातकों में बेरोज़गारी लगभग 40% बताई गई है। जब डिग्री से नौकरी की गारंटी नहीं मिलती, तो छात्र खुद कौशल गढ़ने निकल पड़ते हैं।
पाँचवाँ कारण गिग और फ्रीलांस अर्थव्यवस्था का विस्तार है :
कंटेंट राइटिंग, डिज़ाइन, कोडिंग, ट्यूशन और डिलीवरी जैसे काम अब एक ऐप दूर हैं। अनुमान है कि 2030 तक देश का गिग और फ्रीलांस कार्यबल 2.35 करोड़ तक पहुँच जाएगा। लचीला समय और अतिरिक्त आय इसे आकर्षक बनाते हैं, पर अनियमित भुगतान और पढ़ाई से तालमेल बड़ी चुनौतियाँ हैं।
छठा कारण अनुभव और उद्यमिता की चाह है:
डेलॉइट के सर्वे में 94% Gen Z और 97% मिलेनियल ने औपचारिक सैद्धांतिक पढ़ाई से ज़्यादा ऑन-द-जॉब लर्निंग को महत्व दिया। IIT मंडी के GUESSS 2025 सर्वेक्षण में 22% से ज़्यादा कॉलेज छात्र अपना व्यवसाय शुरू कर चुके थे और 43% शुरू करना चाहते थे।
पढ़ाई के बाद कारोबार की इच्छा 2023 के 14% से बढ़कर 2025 में 16.2% हो गई, जबकि सरकारी नौकरी की चाह 12.7% से घटकर 10.1% रह गई।
फायदे और जोखिम
सही संतुलन में अंशकालिक काम आर्थिक स्वतंत्रता, संचार कौशल, नेटवर्किंग और कार्यस्थल की समझ देता है। OECD के अनुसार सीमित और नियंत्रित काम पढ़ाई से रोज़गार तक के संक्रमण में मदद कर सकता है, बशर्ते पढ़ाई प्रभावित न हो।
खतरा तब है जब घंटे बढ़ जाएँ। एक अध्ययन में सप्ताह में 15 घंटे से अधिक गिग काम करने वाले छात्रों ने पढ़ाई पर ध्यान लगाने में दिक्कत बताई, और काम के घंटों व आत्म-रिपोर्टेड शैक्षणिक प्रदर्शन के बीच उलटा संबंध मिला। गिग काम में अनियमित आय और सामाजिक सुरक्षा की कमी भी चिंता का विषय है।
आगे की राह
विशेषज्ञ और रिपोर्टें कुछ दिशाएँ सुझाती हैं। कॉलेजों में क्रेडिट-आधारित इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और उद्योग-साझेदारी मज़बूत हों, ताकि काम पढ़ाई का हिस्सा बने, उसका विरोधी नहीं।
छात्रों के लिए लचीले समय, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा वाले अंशकालिक मॉडल बनें। पाठ्यक्रम में डिजिटल कौशल, वित्तीय साक्षरता, समय-प्रबंधन और उद्यमिता जुड़ें। गिग काम करने वाले छात्रों के लिए भुगतान की पारदर्शिता और शिकायत निवारण की व्यवस्था हो।
पढ़ाई के साथ काम अब वैकल्पिक शौक नहीं रहा। यह आर्थिक जरूरत, नौकरियों की कड़ी होड़, रोज़गार की अनिश्चितता और डिजिटल अवसरों से बनी एक संरचनात्मक प्रवृत्ति है। यह युवाओं को आत्मनिर्भरता और अनुभव देती है, पर तभी लाभ का सौदा रहेगी जब काम पढ़ाई और सेहत की कीमत पर न हो।