मौजूदा राजनीतिक और संस्थागत संघर्ष में सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर चक्रव्यूह के केंद्र में आ गया है। इस पूरे घटनाक्रम को केवल यह कहकर खारिज कर देना कि “विपक्ष संस्थाओं को बदनाम कर रहा है” वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा होगा।
यह असल में एक दोहरे संकट की कहानी है एक तरफ विपक्ष की आक्रामक सड़क-राजनीति और न्यायपालिका तक सीधे पहुँचने की जिद, और दूसरी तरफ आम नागरिकों के मन में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर बसा पुराना और गहरा अविश्वास।
सुलगता घटनाक्रम: जब सड़क और अदालत आमने-सामने आए
इस पूरे विवाद की शुरुआत विपक्षी दलों (INDIA ब्लॉक) के उस राष्ट्रव्यापी आंदोलन से हुई, जो उन्होंने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित “वोट चोरी” और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर छेड़ा था।
राजनीतिक तापमान तब और बढ़ गया जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत से मिलने का समय मांगा। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने इस मुलाकात से साफ इनकार कर दिया।
उनका तर्क बिल्कुल स्पष्ट और संवैधानिक सीमाओं के दायरे में था: SIR से जुड़े मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं, और ऐसे में किसी लंबित मामले पर राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल से बैठक करना शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) और न्यायिक मर्यादा के पूरी तरह खिलाफ होगा।
सीजेआई ने विपक्ष को स्पष्ट सलाह दी कि वे सड़क के रास्ते के बजाय अदालत में औपचारिक याचिका का रास्ता अपनाएं।
सीजेआई के इस इनकार के बाद राजनीति ने एक नया मोड़ लिया। INDIA ब्लॉक के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक एक बड़ा मार्च निकाला और चुनाव आयोग के खिलाफ औपचारिक याचिका दायर कर दी। इस याचिका में मांग की गई कि SIR प्रक्रिया पर तत्काल अंतरिम रोक लगाई जाए, और चुनाव आयोग की फाइलों, बैठकों के कार्यवृत्त (Minutes), फाइल नोटिंग तथा ECINET-ERONET के डिजिटल लॉग को सार्वजनिक किया जाए।
तर्कों का टकराव: कानूनी और राजनीतिक दांवपेंच
इस पूरे प्रकरण पर कानूनविदों, राजनीतिक विश्लेषकों और खुद विपक्षी खेमे के भीतर विचारों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ है।
विपक्ष का कानूनी और नैतिक आधार यह है कि SIR एक “एकतरफा और मनमाना” प्रशासनिक अभ्यास है, जिसके कारण करोड़ों नागरिकों के नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए और उनके मताधिकार का हनन हुआ।
अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19 (आंदोलन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 21 (जीवन और स्वतंत्रता) तथा 324 (चुनाव आयोग की शक्तियां) का सहारा लिया है।
विपक्ष ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में तकनीकी विशेषज्ञों और प्रतिष्ठित नागरिकों की एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए, ताकि मतदाता सूची की अखंडता और चुनाव प्रक्रिया में जनता का खोया हुआ विश्वास बहाल हो सके। राहुल गांधी ने इसे “संविधान बचाने की लड़ाई” कहा, तो मल्लिकार्जुन खड़गे ने देश में “अघोषित आपातकाल” जैसी स्थिति का आरोप लगाया।
कानूनी विशेषज्ञों के तर्क
इसके विपरीत, कानूनी विशेषज्ञों ने इस तरीके पर तीखे सवाल उठाए हैं।
पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च और सीजेआई से मुलाक़ात की मांग को “सरासर मूर्खता” कहा। उनका केंद्रीय तर्क था कि जब मुद्दा अदालत में लंबित है, तो सड़क पर प्रदर्शन करके या ज्ञापन देकर न्यायालय पर दबाव बनाना न्यायपालिका को “राजनीति का मोहरा” बना देता है।
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साल्वे ने कहा कि राजनीतिक दलों को स्थापित कानूनी प्रक्रिया अपनानी चाहिए और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई कार्रवाई भी उचित संवैधानिक प्रक्रिया व तथ्यों की जांच के बाद हो सकती है, सड़क से नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शन का अधिकार अनुच्छेद 19 के तहत है, लेकिन इसका मतलब पुलिस की वैध प्रतिबंधाओं की अनदेखी नहीं है।
कानूनी विश्लेषक फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने सीजेआई के इनकार को सही बताया, क्योंकि SIR से जुड़े मामले सीजेआई की बेंच के सामने थे। उनका तर्क था कि अदालत को यह नहीं देखना चाहिए कि सड़क पर किसकी संख्या अधिक है, उसका काम कानून, साक्ष्य और मौलिक अधिकारों की जांच है।
मुस्तफ़ा ने जनता में न्यायपालिका के प्रति संदेह की जड़ें पुरानी घटनाओं से जोड़ीं 2018 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई द्वारा प्रधानमंत्री को कोर्ट में ले जाना, उनका बाद में राज्यसभा मनोनयन, और 2024 में प्रधानमंत्री का सीजेआई चंद्रचूड़ के आवास पर कार्यक्रम में शामिल होना। उनके अनुसार ऐसे प्रतीकात्मक कृत्य नागरिकों के मन में स्वतंत्रता को लेकर संदेह पैदा कर सकते हैं, भले ही यह कहना पूरी तरह सही न हो कि अदालत सरकार के साथ है।
राजनीतिक विश्लेषकों का पक्ष
राजनीतिक विश्लेषक विजय त्रिवेदी ने इसे स्पष्ट रूप से राजनीतिक रणनीति बताया। उनके अनुसार राहुल गांधी आंदोलन को हर दिन चर्चा में रखना चाहते हैं, इसलिए सीजेआई से मुलाक़ात की मांग और मार्च दोनों को राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि मुख्य न्यायाधीश जनप्रतिनिधि नहीं होते, उनसे मिलने या ज्ञापन देने के बजाय याचिका ही उचित रास्ता है।
सरकार समर्थक नेताओं का तर्क और भी सीधा है। भाजपा सांसद बसवराज बोम्मई ने मार्च को “असंवैधानिक”, “अवैध” और “प्रतिलोकतांत्रिक” कहा, और आशंका जताई कि अदालत पर राजनीतिक दबाव भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध विद्रोह भड़काने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विपक्ष पर न्यायिक संस्थाओं को “राक्षसीय” बताकर जनविश्वास कमज़ोर करने और “असंवैधानिक” राजनीति करने का आरोप लगाया।
दिलचस्प बात यह है कि यह विपक्ष पूरी तरह इस रणनीति पर एकजुट भी नहीं था। Open मैग्जीन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, INDIA ब्लॉक के कई सहयोगी दल इस मार्च के विचार से अंदरखाने सहमत नहीं थे, खासकर सीजेआई द्वारा मुलाकात ठुकराए जाने के बाद। लेकिन गठबंधन की विवशता और पुलिस कार्रवाई के विरोध ने उन्हें इस मार्च में शामिल होने पर मजबूर कर दिया।
इतिहास के आईने में: न्यायपालिका पर दबाव का पुराना सफर
आज का यह टकराव भले ही ताजा लगे, लेकिन भारतीय राजनीति में न्यायपालिका और कार्यपालिका या सत्ता के बीच तनाव का इतिहास संविधान के जन्म के साथ ही शुरू हो गया था।
शुरुआती तनातनी (1950-60 का दशक):
संविधान लागू होने के तुरंत बाद भूमि सुधार कानूनों को लेकर अदालतों और सरकार में ठन गई। 1967 के Golak Nath मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों को छीन नहीं सकती, जिससे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार से टकराव बढ़ा।
यह दौर यह दिखाता है कि न्यायिक स्वतंत्रता और संसदीय संप्रभुता के बीच तनाव संविधान के शुरुआती वर्षों से ही चला आ रहा है। 1967 के ऐतिहासिक गोकलनाथ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि संसद मौलिक अधिकारों को कम नहीं कर सकती, जिससे कार्यपालिका और न्यायपालिका का टकराव सतह पर आ गया।
केशवानंद भारती और जजों की वरिष्ठता का हनन (1973):
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का सबसे बड़ा भूचाल 24 अप्रैल 1973 को आया, जब केशवानंद भारती मामले में 7:6 के बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने “मूल ढांचा” (Basic Structure) का सिद्धांत दिया और स्पष्ट कर दिया कि संसद संविधान के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकती।
सरकार के लिए यह बहुत बड़ा झटका था। इसके ठीक अगले दिन, सरकार ने परंपरा को तोड़ते हुए बहुमत के खिलाफ जाने वाले तीन वरिष्ठतम जजों (जस्टिस जे.एम. शेलत, के.एस. हेगड़े और ए.एन. ग्रोवर) को नजरअंदाज कर दिया और उनके जूनियर जस्टिस ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया। इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सबसे सीधा प्रहार माना गया।
आपातकाल का काला अध्याय (1975-1977):
25 जून 1975 को जब देश में आपातकाल लगा, तो न्यायपालिका की रीढ़ तोड़ने की सबसे भीषण कोशिश हुई। 1976 के एडीएम जबलपुर (हेबियस कॉर्पस) मामले में सुप्रीम कोर्ट के पांच में से चार जजों ने सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए माना कि आपातकाल में जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार (Article 21) भी छीना जा सकता है।
उस वक्त सिर्फ जस्टिस एच.आर. खन्ना ने अदम्य साहस दिखाते हुए असहमति दर्ज की, जिसके चलते 1977 में वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें सीजेआई बनने से वंचित कर दिया गया। आपातकाल के दौरान सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले 16 हाईकोर्ट जजों का एक साथ दंडात्मक तबादला किया गया, 38वें और 42वें संशोधनों के जरिए न्यायिक पुनर्विलोकन की ताकतों को बुरी तरह सीमित कर दिया गया।
आपातकाल के बाद के सुधार: इन कड़वे अनुभवों से सीख लेते हुए बाद के दशकों में न्यायपालिका ने अपनी रक्षा के लिए ‘कॉलेजियम प्रणाली’ विकसित की, ताकि जजों की नियुक्तियों में कार्यपालिका का एकाधिकार खत्म हो सके।
आज का संकट और असली खतरा
आज का वर्तमान विवाद आपातकाल जितना क्रूर या संस्थागत रूप से विध्वंसक नहीं है न तो कोई आपातकाल लगा है, न जजों की वरिष्ठता छीनी गई है और न संविधान संशोधन कर अदालत के पंख काटे गए हैं। फिर भी, यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जनता और राजनीतिक दलों के बीच संस्थाओं पर छाए गहरे अविश्वास को उजागर करता है।
असली खतरा न तो विपक्ष का कोई विरोध प्रदर्शन है और न ही राजनेताओं के तीखे बयान, बल्कि यह पारस्परिक अविश्वास का वह दुष्चक्र है जहाँ एक तरफ नागरिकों को यह लगने लगता है कि चुनाव आयोग या अदालतें उनकी बुनियादी लोकतांत्रिक और चुनावी शिकायतों पर उतनी तेजी से मुखर या प्रभावी क्यों नहीं हैं, और दूसरी तरफ सत्ता पक्ष इसे संस्थाओं को अस्थिर करने का राजनीतिक षड्यंत्र मान बैठता है।
लोकतंत्र तभी अपनी असली गरिमा के साथ जीवंत रह सकता है जब राजनीतिक दल अपनी लड़ाइयां सड़कों पर संस्थाओं की साख गिराकर लड़ने के बजाय कानून के गलियारों में सबूतों के साथ लड़ें, और न्यायपालिका किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव से पूरी तरह ऊपर उठकर केवल संविधान की कसौटी पर खरी उतरे।