छत्तीसगढ़ की राजनीति में नाम में बहुत कुछ रखा है। खासकर तब, जब नाम ‘तेलीबांधा’ हो, बदलने वाली सरकार हो और ऐतराज़ करने वाला राज्य का सबसे बड़ा सामाजिक वर्ग।
रायपुर का सबसे व्यस्त और चर्चित चौराहा, जिसका नाम बोलने के लिए शहर के लोगों को सोचना नहीं पड़ता: तेलीबांधा चौक।
अब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इसे ‘सेवा ज्योति संकल्प चौक’ के रूप में विकसित करने की घोषणा की है। घोषणा के बाद विवाद सिर्फ़ एक चौराहे के पुनर्विकास तक नहीं रहा।
राज्य के सबसे बड़े सामाजिक वर्गों में गिने जाने वाले “साहू समाज” के विरोध ने इसे सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया।
1. विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
राज्य सरकार की सौंदर्यीकरण और बुनियादी ढाँचा विकास योजनाओं के तहत रायपुर के प्रमुख चौराहों को नया रूप देने की घोषणाएँ हुईं। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री साय ने तेलीबांधा चौक को ‘सेवा ज्योति संकल्प चौक’ के रूप में विकसित करने और उसके जीर्णोद्धार की योजना सार्वजनिक की।
इसके तुरंत बाद छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ युवा प्रकोष्ठ ने आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई:-
शशिकांत साहू , प्रदेश अध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ), ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि किसी ऐतिहासिक स्थल का नाम बदलना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, यह उस स्थान से जुड़ी जनभावनाओं पर सीधा असर डालता है।
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– समाज ने साफ़ किया कि वे स्मार्ट सिटी या रायपुर नगर निगम के किसी भी विकास या सौंदर्यीकरण कार्य के ख़िलाफ़ नहीं हैं।
– उनका ऐतराज़ सिर्फ़ ‘तेलीबांधा’ नाम और उसकी ऐतिहासिक पहचान को पूरी तरह हटाने या बदलने पर है।
यानी लड़ाई विकास बनाम विरोध की नहीं है। लड़ाई विकास के साथ पहचान बचाने की है।
2. तेलीबांधा का इतिहास: तालाब से ‘मरीन ड्राइव’ तक
रायपुर शहर के पूर्वी छोर पर बसा तेलीबांधा इलाक़ा छत्तीसगढ़ की सामाजिक और भौगोलिक बनावट से गहराई से जुड़ा माना जाता है।
नाम की कहानी –
नाम खुद एक पहेली की तरह है, जिसके दो हिस्से हैं:
– तेली यानी साहू समाज।
– बांधा यानी तालाब या जलाशय।
छत्तीसगढ़ी और हिंदी साहित्य में इसका यही अर्थ है।
निर्माण: इस तालाब का निर्माण 1835 में मालगुजार दीनानाथ साव और उनके पुत्र शोभाराम साव ने पानी की कमी को दूर करने के लिए करवाया था।
ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मध्यकाल और ब्रिटिश दौर में रायपुर के विकास में स्थानीय तेली (साहू) समाज के सेठों और मालगुज़ारों का बड़ा योगदान रहा।
तेलीबांधा तालाब, जिसके नाम पर पूरे इलाक़े और चौक का नाम पड़ा, का निर्माण और देखरेख पारंपरिक रूप से साहू समाज के पूर्वजों और स्थानीय जल-संरक्षण की परंपरा से जुड़ी बताई जाती है।
यानी चौक का नाम पुराने रायपुर के नक्शे में समाज का हस्ताक्षर माना जाता है।
आधुनिक रायपुर की धड़कन-
मरीन ड्राइव का रूप: 2010 के दशक में रायपुर नगर निगम और प्रशासन ने तेलीबांधा तालाब का पुनर्विकास कर उसे ‘तेलीबांधा लेकफ्रंट’ बनाया, जिसे स्थानीय भाषा में मरीन ड्राइव कहा जाता है।
आज की पहचान: आज यह चौक और लेकफ्रंट रायपुर का सबसे प्रमुख लैंडमार्क, पर्यटन केंद्र और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र है।
समाज का तर्क:
साहू समाज के अनुसार, यह नाम उनकी ऐतिहासिक विरासत यानी ‘लेगेसी’ को उजागर करता है।
यही इस विवाद का दिलचस्प मोड़ है। जिस नाम को बदलने की बात हो रही है, वही आज रायपुर की पहचान बन चुका है।
3. सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू: ‘स्मृति विलोपन’ का डर
साहू समाज का कहना है कि उनका तर्क सिर्फ़ राजनीति से प्रेरित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण से जुड़ा है।
साहू संघ युवा प्रकोष्ठ का कहना है:
“जब आप किसी स्थापित और ऐतिहासिक चौक का नाम पूरी तरह बदल देते हैं, तो आप इतिहास के उस पन्ने को मिटा देते हैं जो भावी पीढ़ियों को उनके पूर्वजों के योगदान की याद दिलाता है। हम सरकार से विकास का विरोध नहीं, बल्कि अपनी पहचान के संरक्षण की मांग कर रहे हैं।”
समाज की दलीलें:
– भक्त माता कर्मा और माता राजिम की परंपरा को मानने वाला यह समाज छत्तीसगढ़ के श्रम, कृषि और व्यापारिक इतिहास का मुख्य स्तंभ रहा है।
– अगर सरकार ‘सेवा ज्योति संकल्प’ के नाम पर कोई चौक बनाना चाहती है, तो नए बन रहे ओवरब्रिज, एक्सप्रेस-वे या नवा रायपुर के किसी प्रमुख जंक्शन को यह नाम दिया जा सकता है।
4. सियासी गणित: क्यों हल्के में नहीं लिया जा सकता यह विरोध?
छत्तीसगढ़ की जनसांख्यिकी और चुनावी राजनीति में साहू समाज की स्थिति निर्णायक मानी जाती है।
कुल आबादी में हिस्सेदारी – लगभग 20% (करीब 55 से 60 लाख)
प्रभावित विधानसभा सीटें – 25 से 30 (मैदानी क्षेत्र)
सियासी पहचान – राज्य का सबसे बड़ा OBC वोट बैंक
राज्य का सबसे बड़ा OBC वोट बैंक –
छत्तीसगढ़ की लगभग 3 करोड़ आबादी में OBC की हिस्सेदारी 45% से अधिक मानी जाती है, और उसमें अकेला साहू समाज करीब 20-24% का हिस्सा रखता है।
प्रभावशाली सीटें:
राज्य में लगभग 25 से 37 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहाँ साहू मतदाता सीधे तौर पर चुनाव के नतीजे को प्रभावित करते हैं।
प्रशासनिक पकड़:
पिछले दो दशकों में साहू समाज ने न केवल राजनीति में बल्कि सरकारी नौकरियों और प्रशासनिक तंत्र के मध्यम व निचले स्तर पर भी अपनी मजबूत पकड़ बनाई है,
इसे राज्य का सबसे संगठित और मतदान के मामले में सबसे जागरूक सामाजिक समूह माना जाता है।
मैदानी छत्तीसगढ़ पर पकड़ :
रायपुर, दुर्ग, महासमुंद, धमतरी, बेमेतरा, कवर्धा और बिलासपुर जैसे मैदानी ज़िलों में साहू मतदाताओं की सघनता बहुत ज़्यादा है।
रायपुर ग्रामीण, अभनपुर, राजिम, कुरुद, दुर्ग ग्रामीण, धमतरी, साजा और महासमुंद जैसी दर्जनों सीटों पर इस समाज का समर्थन किसी भी पार्टी के प्रत्याशी की जीत-हार तय कर सकता है।
दोनों पार्टियों में चेहरे-
भाजपा: उपमुख्यमंत्री अरुण साव स्वयं साहू समाज के बड़े चेहरे हैं। भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में इस समाज की मज़बूत हिस्सेदारी रही है।
कांग्रेस: पूर्व गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू जैसे कद्दावर नेता इसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसलिए मुख्यमंत्री साय की सरकार के लिए अपने एक मज़बूत सामाजिक आधार की भावनाओं की अनदेखी राजनीतिक रूप से जोखिम भरी हो सकती है।
और यह नाराज़गी किसी एक पार्टी की समस्या भी नहीं है, इसलिए इसे विपक्ष की चाल कहकर टालना आसान नहीं होगा।
5. संभावित बीच का रास्ता –
विवाद शांत करने के लिए प्रशासन और सरकार के पास आम तौर पर तीन विकल्प हैं:
1. हाइब्रिड नामकरण:
चौराहे का नाम ‘तेलीबांधा – सेवा ज्योति संकल्प चौक’ रखा जाए। मूल नाम भी सुरक्षित रहे और सरकारी संकल्प का प्रतीक भी स्थापित हो।
2. स्मारक या स्तंभ का निर्माण:
चौक का नाम ‘तेलीबांधा चौक’ ही रहे, लेकिन भीतर बनने वाले मुख्य सौंदर्यीकरण ढाँचे, टावर या सर्कल का नाम ‘सेवा ज्योति संकल्प स्मारक’ रखा जाए।
3. स्थान परिवर्तन:
साहू समाज के सुझाव के अनुसार ‘सेवा ज्योति संकल्प चौक’ को नवा रायपुर या रायपुर-बिलासपुर मार्ग के किसी नए बड़े फ्लाईओवर या चौराहे पर स्थापित किया जाए।
आगे क्या?
राज्य के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए उम्मीद यही जताई जा रही है कि सरकार सर्वसम्मति और सामाजिक सौहार्द को प्राथमिकता देते हुए ऐसा रास्ता निकालेगी, जिससे विकास कार्य भी न रुके और समाज की ऐतिहासिक पहचान भी अक्षुण्ण रहे।
भारत में चौराहे सिर्फ़ ट्रैफ़िक नहीं सँभालते, पहचान भी सँभालते हैं और जब सरकार का संकल्प और समाज की स्मृति एक ही चौराहे पर टकरा जाएँ, तो फ़ैसला अक्सर सड़क पर नहीं, सियासत की गिनती में सुनाया जाता है।