डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट में DPDP Act, 2023 और उसके नियमों को चुनौती दी है। उनका मुख्य तर्क है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं है, इसलिए यह जांच-पत्रकारिता, सूत्रों की गोपनीयता और जनहित की रिपोर्टिंग को रोक सकता है।
किसने याचिका दायर की ?
DNPA, जो 21 प्रमुख समाचार संगठनों के डिजिटल प्रकाशनों का प्रतिनिधित्व करता है, ने यह याचिका दायर की है। इसमें DPDP Act और Digital Personal Data Protection Rules, 2025 के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताया गया है।
याचिका में कहा गया है कि यह कानून प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों के सूचना के अधिकार पर हमला है। DNPA ने कई प्रावधानों को रद्द करने और चुनौती वाले प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग भी की है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?
27 अक्टूबर 2026 को chief Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन-जज बेंच ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा। बेंच में Justices Joymalya Bagchi और V. Mohana भी शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा कि नागरिकों की privacy और press freedom के बीच संतुलन बनाना होगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से यह भी कहा कि वे अगली सुनवाई से पहले ऐसे सुरक्षा उपाय सुझाएं जिनसे पत्रकारिता की छूट का दुरुपयोग रोका जा सके।
मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होनी है। कोर्ट ने बिना सरकार की ओर से सुनवाई किए चुनौती वाले प्रावधानों पर तत्काल रोक नहीं लगाई।
पत्रकारों की मुख्य आपत्ति क्या है ?
DNPA का केंद्रीय विवाद यह है कि DPDP Act में पत्रकारिता के लिए कोई विशेष छूट नहीं है। यानी न तो Section 7 की “legitimate uses” में और न ही Section 17 की छूटों में समाचार रिपोर्टिंग को स्पष्ट रूप से सुरक्षा दी गई है।
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याचिका के मुताबिक, इससे पत्रकारों पर ये दायित्व लग सकते हैं:
- किसी व्यक्ति की निजी जानकारी इस्तेमाल करने से पहले उसे सूचना देना।
- रिपोर्ट में उसके नाम, फोटो, पते, फोन नंबर या अन्य पहचान योग्य विवरण के लिए पहले से सहमति लेना।
- व्यक्ति के सहमति वापस लेने पर डेटा मिटाने की मांग का सामना करना।
- प्रकाशित रिपोर्ट में शामिल निजी डेटा को बाद में हटाने या संशोधित करने की मांग का सामना करना।
पत्रकारों का कहना है कि ये शर्तें सामान्य रिपोर्टिंग और जांच की प्रक्रिया के साथ असंगत हैं, क्योंकि अक्सर जिन लोगों पर रिपोर्ट बनती है वे सहमति नहीं देंगे।
जांच-पत्रकारिता को खतरा क्यों?
जांच-पत्रकारिता में अक्सर ऐसे लोगों की जानकारी इस्तेमाल होती है जो भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, हिंसा, शक्ति के दुरुपयोग या अन्य गलत कामों से जुड़े होते हैं। ऐसे लोग शायद ही कभी अपने डेटा के प्रकाशन के लिए सहमति दें।
DNPA का तर्क है कि अगर रिपोर्ट प्रकाशित करने से पहले संबंधित व्यक्ति की सहमति जरूरी हो जाए, तो यह व्यावहारिक रूप से prior censorship या पूर्व-सेंसरशिप बन सकती है। यानी जिस व्यक्ति पर आरोप है, वही तय कर सकेगा कि उस पर रिपोर्ट छपेगी या नहीं।
सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने DNPA की ओर से तर्क दिया कि इससे रूटीन न्यूज़ गैदरिंग भी मुश्किल हो सकती है और न्यूज़रूम का कामकाज प्रभावित होगा।
सूत्रों की गोपनीयता का मुद्दा
पत्रकारिता की एक बुनियादी शर्त है कि सूत्र की पहचान सुरक्षित रहे, खासकर जब वह व्यक्ति नौकरी, सुरक्षा या जान के जोखिम में हो। DNPA का कहना है कि DPDP ढांचे में डेटा की पहचान, प्रोसेसिंग और मिटाने से जुड़ी शर्तें सूत्रों की गोपनीयता को कमजोर कर सकती हैं|
अगर किसी सूत्र की जानकारी को “personal data” मानकर उस पर सहमति, सूचना या मिटाने के नियम लागू हों, तो सूत्र को उजागर होने का खतरा बढ़ सकता है। याचिका में यही चिंता जताई गई है कि इससे जांच-पत्रकारिता प्रभावित होगी।
सूचना के अधिकार पर दावा
DNPA ने कहा है कि यह कानून नागरिकों के right to information को भी कमजोर कर सकता है। उनका तर्क है कि जनहित की जानकारी छापने में अत्यधिक डेटा-संरक्षण बाधाएं आएंगी, जिससे जनता को जरूरी सार्वजनिक जानकारी तक पहुंच कम होगी।
यह बहस मूल रूप से दो संवैधानिक मूल्यों के बीच है: एक ओर व्यक्ति की निजता, दूसरी ओर प्रेस की स्वतंत्रता और जनता का जानने का अधिकार।
DPDP Act : सरकार का पक्ष
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि DPDP Act प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित नहीं करता और प्रेस की स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित है।
सरकार का तर्क यह होगा कि डेटा संरक्षण कानून नागरिकों की निजता की रक्षा के लिए है और उसमें पहले से ऐसी छूटें मौजूद हैं जो कानूनी, सार्वजनिक हित और अपराध से जुड़े कामों को कवर करती हैं।
अदालत को क्या तय करना है?
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना होगा कि क्या DPDP Act में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट जोड़ी जानी चाहिए या मौजूदा प्रावधान पर्याप्त हैं। कोर्ट को यह भी देखना होगा कि क्या सहमति, सूचना और मिटाने के नियम जनहित रिपोर्टिंग को अव्यवहारिक बना देते हैं।
अगर कोर्ट पत्रकारिता के लिए एक सीमित छूट मानता है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह छूट झूठी खबर, बदनामी, निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप या डेटा के दुरुपयोग के लिए इस्तेमाल न हो। यही कारण है कि कोर्ट ने DNPA से संतुलन बनाने वाले सुरक्षा उपाय मांगे हैं।
संभावित परिणाम
- पत्रकारिता की छूट: कोर्ट सार्वजनिक हित की रिपोर्टिंग के लिए सीमित छूट या विशेष सुरक्षा उपाय मान सकता है।
- मौजूदा कानून बरकरार: सरकार यह दलील दे सकती है कि मौजूदा छूटें और नियम पत्रकारिता को पर्याप्त सुरक्षा देते हैं।
- नियमों में संशोधन: कोर्ट सरकार को नियमों में संशोधन या स्पष्टीकरण जारी करने का निर्देश दे सकता है।
- आंशिक रद्द : अगर कोर्ट को प्रावधान असंवैधानिक लगें, तो वह कुछ हिस्सों को रद्द या सीमित कर सकता है।
अगली सुनवाई 17 नवंबर को है, और तब तक DNPA को अपने सुझाए गए सुरक्षा उपाय केंद्र सरकार और कोर्ट के सामने रखने होंगे।