छत्तीसगढ़ सरकार राज्य के पाँच प्रमुख शक्तिपीठों को एक “छत्तीसगढ़ आस्था पथ” नाम के लगभग 1,000 किमी लंबे धार्मिक-पर्यटन सर्किट से जोड़ने की तैयारी कर रही है।
इसे उत्तराखंड के चारधाम सर्किट की तर्ज पर विकसित करने की बात कही जा रही है; शुरुआती बजटीय प्रावधान ₹5 करोड़ बताया गया है।
परियोजना में कौन-कौन से मंदिर हैं?
यह कॉरिडोर पाँच देवी मंदिरों को जोड़ेगा, जिन्हें राज्य के प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है:
रतनपुर – माँ महामाया ( बिलासपुर )
चंद्रपुर – माँ चंद्रहासिनी ( जांजगीर -चाम्पा )
डोंगरगढ़ – माँ बम्लेश्वरी ( राजनंदगाँव )
दंतेवाड़ा – माँ दंतेश्वरी ( दंतेवाड़ा )
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कुदरगढ़ – माँ बागेश्वरी/कुदरगढ़ी ( सूरजपुर )
इनमें दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी मंदिर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे 52 शक्तिपीठों में गिना जाता है और यह बस्तर क्षेत्र की प्रमुख आस्था का केंद्र है |
रतनपुर से दंतेवाड़ा तक संभावित रूट
सर्किट का विचार राज्य के उत्तर से दक्षिण तक फैले मंदिरों को सड़क-सुविधा, ठहराव, पार्किंग, पेयजल, स्वच्छता और सुरक्षा से जोड़ने का है।
एक संभावित यात्रा क्रम इस प्रकार समझा जा सकता है:
कुदरगढ़ (सूरजपुर) → रतनपुर (बिलासपुर) → चंद्रपुर (जनजगिरी-चाम्पा) → डोंगरगढ़ (राजनंदगाँव) → दंतेवाड़ा।
यह रूट लगभग पूरे राज्य को छूता है छत्तीसगढ़ के उत्तरी सीमा से लेकर बस्तर संभाग तक। इसलिए सरकार इसे केवल मंदिरों का कनेक्शन नहीं, बल्कि राज्य के धार्मिक पर्यटन का “स्पाइन” बनाने की योजना के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
चारधाम मॉडल से तुलना
चारधाम यात्रा में श्रद्धालु एक निश्चित धार्मिक सर्किट पर चलते हैं, जिससे रास्ते के होटल, ढाबे, परिवहन, गाइड और स्थानीय दुकानों को नियमित आय मिलती है।
छत्तीसगढ़ भी यही मॉडल अपनाना चाहता है यानी एक यात्रा में कई मंदिर, और हर मंदिर के आसपास स्थानीय अर्थव्यवस्था को गतिविधि।
लेकिन अंतर यह है कि चारधाम पहाड़ी और कठिन भौगोलिक क्षेत्र में है, जबकि छत्तीसगढ़ का सर्किट मुख्यतः सड़क-आधारित होगा। इसका फायदा यह हो सकता है कि यात्रा अपेक्षाकृत सस्ती और अधिक लोगों के लिए सुलभ बन सकती है।
छत्तीसगढ़ बनने के बाद क्यों जरूरी?
छत्तीसगढ़ 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर बना था। राज्य बनने के बाद इसकी सबसे बड़ी चुनौती रही है कि खनिज संपदा के बावजूद रोजगार, पर्यटन और बस्तर-सूरजपुर जैसे दूरदराज के क्षेत्रों का विकास सीमित रहा। ऐसे में धार्मिक पर्यटन को एक नया आर्थिक इंजन बनाने की कोशिश समझी जा सकती है।
राज्य सरकार ने पर्यटन को उद्योग का दर्जा भी दिया है और होमस्टे, धार्मिक पर्यटन योजनाओं तथा निवेश को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। इस नए शक्तिपीठ सर्किट को उसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
संभावित सकारात्मक प्रभाव-
रोजगार: रास्ते में होटल, होमस्टे, रेस्टोरेंट, परिवहन, गाइड, पुजारी, सफाई कर्मी और हस्तशिल्प विक्रेताओं के लिए अवसर बढ़ेंगे।
बस्तर और दंतेवाड़ा का लाभ: माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, सुरक्षा और पर्यटन बुनियादी ढांचे से स्थानीय लोगों को बाहरी दुनिया से जुड़ने का मौका मिल सकता है।
मंदिरों की पहचान: रतनपुर, डोंगरगढ़ और कुदरगढ़ जैसे स्थल राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर अधिक प्रमुख होंगे।
स्थानीय अर्थव्यवस्था: तीर्थयात्रियों की खरीद से कृषि, डेयरी, हस्तशिल्प, मिठाई, पूजा सामग्री और स्थानीय परिवहन को फायदा पहुँच सकता है।
संभावित नकारात्मक प्रभाव-
भीड़ और पर्यावरण दबाव: त्योहारों और नवरात्रि के दौरान बढ़ती भीड़ से कचरा, जल की खपत, यातायात जाम और मंदिर परिसर पर दबाव बढ़ सकता है।
आदिवासी क्षेत्रों पर असर: दंतेवाड़ा और बस्तर में विकास कार्यों से भूमि अधिग्रहण, विस्थापन या स्थानीय संस्कृति पर असर का जोखिम तब बढ़ता है जब स्थानीय समुदायों की सहमति और परामर्श न हो।
व्यापारीकरण का खतरा: धार्मिक स्थलों के आसपास अत्यधिक व्यावसायिक गतिविधि से आध्यात्मिक माहौल प्रभावित हो सकता है और स्थानीय लोगों के बजाय बाहरी निवेशकों को ज्यादा लाभ मिल सकता है
सुरक्षा चुनौती: दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में पर्यटन बढ़ाने के लिए कानून-व्यवस्था, सड़क सुरक्षा और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करना जरूरी होगा।
बजट और निष्पादन का सवाल: असली परीक्षा विस्तृत परियोजना, केंद्रीय सहायता और समयबद्ध कार्यान्वयन की होगी।
सफलता के लिए क्या जरूरी है?
इस परियोजना का असर तभी सकारात्मक होगा जब सरकार केवल मंदिरों की सजावट न करे, बल्कि:
– स्थानीय आदिवासी समुदायों और मंदिर ट्रस्टों को निर्णय में शामिल करे।
– होमस्टे और स्थानीय हस्तशिल्प को प्राथमिकता दे, ताकि लाभ गाँव तक पहुँचे।
– मंदिरों के पास ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, पेयजल, शौचालय, पार्किंग और आपातकालीन सुविधाएँ बनाए।
– दंतेवाड़ा में सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क सुविधाओं को भी सुधारे।
– पर्यावरणीय मूल्यांकन और वन्यजीव/वन क्षेत्रों के संरक्षण को नजरअंदाज न करे।
संक्षेप में, यह योजना छत्तीसगढ़ को “खनिज राज्य” की पहचान से आगे बढ़ाकर “आस्था और संस्कृति का राज्य” बनाने की कोशिश है। अगर इसे स्थानीय हित, पर्यावरण और पारदर्शी निष्पादन के साथ लागू किया जाए, तो यह बस्तर से सूरजपुर तक की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा अवसर बन सकता है लेकिन केवल भव्य घोषणा रह गई तो इसका असर सीमित रहेगा।