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नक्सल-मुक्त भारत: सुरक्षा, विकास और सुशासन की नई दिशा

31 July 2026
KharunTimes

नक्सल-मुक्त भारत : भारत में वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) कई दशकों तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना रहा।

विशेष रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अनेक क्षेत्र इसकी चपेट में रहे।

नक्सली हिंसा के कारण हजारों नागरिकों और सुरक्षा बलों के जवानों की जान गई तथा विकास कार्य भी प्रभावित हुए।

केंद्र सरकार ने सुरक्षा अभियान, आधुनिक तकनीक, विकास योजनाओं और पुनर्वास नीति को एक साथ लागू करते हुए नक्सलवाद के खिलाफ व्यापक रणनीति अपनाई।

इसी के परिणामस्वरूप 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल-मुक्त बनाने का लक्ष्य पूरा होने का दावा किया गया है।

सुरक्षा परिदृश्य में ऐतिहासिक सुधार

सरकार के अनुसार वर्ष 2014 में देश के 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, जबकि वर्तमान में यह संख्या घटकर केवल दो रह गई है।

वर्ष 2015 में 35 सर्वाधिक प्रभावित जिलों की पहचान की गई थी, जो अब शून्य हो चुके हैं।

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नक्सली घटनाएं दर्ज करने वाले पुलिस थानों की संख्या भी लगभग 350 से घटकर केवल सात रह गई है।

यह परिवर्तन सुरक्षा रणनीति की प्रभावशीलता को दर्शाता है।

पिछले 11 वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 596 नए पुलिस थाने स्थापित किए गए।

वहीं पिछले छह वर्षों में 406 नए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) शिविर बनाए गए।

जवानों की सुरक्षा के लिए 400 बुलेट एवं ब्लास्ट प्रूफ वाहन उपलब्ध कराए गए तथा 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड तैयार किए गए।

इसके साथ ही सुरक्षा बलों के लिए पांच विशेष अस्पताल भी स्थापित किए गए, जिससे कठिन परिस्थितियों में भी बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सके।

सैन्य अभियान और आधुनिक तकनीक की भूमिका

हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के विरुद्ध लगातार अभियान चलाए।

मार्च 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में 706 नक्सली मारे गए, 2,218 गिरफ्तार हुए और 4,839 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया।

अभियानों में आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग किया गया।

ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित डेटा विश्लेषण ने सुरक्षा बलों को सटीक जानकारी उपलब्ध कराई।

इसी क्रम में ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के तहत तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित नक्सली ठिकानों को 21 दिनों तक चले अभियान में ध्वस्त किया गया।

इस अभियान के दौरान हथियारों और विस्फोटक सामग्री के निर्माण से जुड़े कई ठिकानों को भी नष्ट किया गया।

नक्सल-मुक्त भारत : विकास और आधारभूत ढांचे का विस्तार

सरकार ने यह स्पष्ट किया कि केवल सुरक्षा अभियान पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए विकास कार्यों को समान प्राथमिकता दी गई।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 17,589 किलोमीटर सड़कों की स्वीकृति दी गई, जिनमें लगभग 12,000 किलोमीटर सड़कें तैयार हो चुकी हैं।

इन परियोजनाओं पर लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

संचार व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 6,000 करोड़ रुपये की लागत से 5,000 मोबाइल टावर लगाए गए तथा 8,000 नए 4G टावर लगाने के निर्देश जारी किए गए।

बेहतर सड़क और संचार व्यवस्था से प्रशासन की पहुंच बढ़ी तथा स्थानीय लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर मिले।

स्वास्थ्य, स्थानीय शासन और पुनर्वास नीति

सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं और स्थानीय प्रशासन को भी मजबूत किया।

जगदलपुर में 240 बिस्तरों वाला सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाया गया।

बस्तर के गांवों में स्कूल और राशन की दुकानों का विस्तार किया गया।

स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए प्रत्येक नक्सल-मुक्त पंचायत को गांव के विकास हेतु एक करोड़ रुपये देने की विशेष व्यवस्था की गई।

आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए विशेष नीति लागू की गई।

इसके अंतर्गत 50,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि, समूह में आत्मसमर्पण करने पर दोगुनी सहायता, हथियार जमा कराने पर अतिरिक्त प्रोत्साहन,

36 महीनों तक प्रति माह 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता तथा प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ प्रदान किया गया।

स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से उन्हें सामान्य नागरिक जीवन में पुनः स्थापित करने का प्रयास किया गया।

चिंताएं और आगे की राह

हालांकि नक्सलवाद में उल्लेखनीय कमी आई है, फिर भी चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं मानी जा सकती।

बचे हुए उग्रवादी समूहों की गतिविधियों पर निरंतर निगरानी आवश्यक है।

सीमावर्ती क्षेत्रों में खुफिया तंत्र को मजबूत रखना, AI और सैटेलाइट आधारित निगरानी जारी रखना तथा विकास योजनाओं को निरंतर लागू करना भविष्य की प्रमुख आवश्यकताएं हैं।

इसके साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रसार, स्थानीय युवाओं को रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास से जोड़ना

तथा पुनर्वास योजनाओं की प्रभावी निगरानी भी आवश्यक है, ताकि नक्सलवाद दोबारा पनपने का अवसर न मिले।

अंत में –

नक्सल-मुक्त भारत अभियान सुरक्षा, विकास और सुशासन के समन्वित मॉडल का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

सुरक्षा बलों की निर्णायक कार्रवाई, आधुनिक तकनीक का उपयोग, आधारभूत ढांचे का विस्तार

और प्रभावी पुनर्वास नीति ने नक्सलवाद को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि इस उपलब्धि को स्थायी बनाने के लिए निरंतर सतर्कता, विकास कार्यों की गति और स्थानीय समुदायों का विश्वास बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा।

इसी समन्वित दृष्टिकोण से भारत दीर्घकाल तक नक्सलवाद जैसी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से मुक्त रह सकता है।

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Laxya Sahu
About the author

Laxya Sahu

लक्ष्य साहू मूलतः नया रायपुर के अभनपुर के निवासी हैं। वे खारुन टाइम्स के प्रधान संपादक हैं तथा सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन करते हैं । उनकी कृति "चार समाज की बात" समकालीन सामाजिक सरोकारों पर आधारित है । छात्र जीवन से ही वे सामाजिक एवं छात्र हित के मुद्दों से जुड़े रहे हैं , इस दौरान उन्होंने अनेक छात्र एवं जनहित संबंधी आंदोलनों को खड़ा कर उनका नेतृत्व किया तथा लगभग आठ वर्षों तक विद्यार्थियों के विकास के उद्देश्य से शैक्षणिक, सामाजिक और नेतृत्व विकास कार्यक्रमों का आयोजन एवं संचालन किया। वर्तमान में वे पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर नियमित कार्य कर रहे हैं।

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