छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में अक्टूबर 2024 में हुआ मां-बेटी हत्याकांड प्रदेश के सबसे चर्चित और भयावह अपराधों में गिना गया। इस मामले में पुलिस प्रधान आरक्षक तालिब शेख की 35 वर्षीय पत्नी और उनकी 11 वर्षीय बेटी की हत्या की गई थी।
जांच और सुनवाई के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट ने मुख्य आरोपी कुलदीप साहू सहित तीन दोषियों को फांसी की सजा तथा एक अन्य आरोपी को मृत्यु तक आजीवन कारावास दिया। अदालत ने अपराध को अत्यंत नृशंस बताते हुए कहा कि यह माफी योग्य नहीं है।
13 अक्टूबर 2024 की भयावह रात
घटना 13 अक्टूबर 2024 की रात सूरजपुर शहर में हुई। पीड़ित महिला एक प्रधान आरक्षक की पत्नी थीं और उनकी बेटी की उम्र 11 वर्ष थी।
अभियोजन के अनुसार, मुख्य आरोपी कुलदीप साहू अपने साथियों चंद्रकांत उर्फ सीके चौधरी, फूल सिंह उर्फ रिंकू और आर्यन उर्फ गोल्डी विश्वकर्मा के साथ वारदात में शामिल था।
अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि आरोपियों ने पहले महिला के साथ यौन हिंसा की। इसके बाद मां और बेटी की धारदार हथियार से बेरहमी से हत्या कर दी गई।
हत्या के बाद आरोपियों ने दोनों शवों को घर से दूर पीढ़ा गांव की ओर फेंक दिया। यह स्थान उनके घर से लगभग चार से पांच किलोमीटर दूर बताया गया।
यह केवल हत्या का मामला नहीं था, बल्कि एक परिवार के खिलाफ की गई ऐसी हिंसा थी जिसने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया।
हमारे WhatsApp ग्रुप से जुड़ें
छत्तीसगढ़ की ब्रेकिंग न्यूज़, ग्राउंड रिपोर्ट और महत्वपूर्ण अपडेट सबसे पहले सीधे अपने WhatsApp पर प्राप्त करें।
मां के शरीर पर 33 और बच्ची के शरीर पर 28 चोटों के निशान पाए जाने की जानकारी सामने आई अर्थात दोनों के शरीर पर कुल 61 चोटों के निशान थे।
पुलिस जांच और आरोपियों तक पहुंच
घटना सामने आने के बाद सूरजपुर पुलिस ने हत्या, दुष्कर्म और नाबालिग पीड़िता से जुड़े अपराधों के तहत जांच शुरू की।
चूंकि पीड़ित परिवार पुलिस विभाग से जुड़ा था और अपराध की प्रकृति बेहद गंभीर थी, इसलिए मामले की जांच को प्राथमिकता दी गई।
पुलिस और अभियोजन ने अदालत में फॉरेंसिक तथा परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए। इनमें घटनास्थल अथवा संबंधित स्थानों से मिले फिंगरप्रिंट, खून के निशान, जब्त कपड़े और डीएनए सामग्री जैसे साक्ष्य शामिल बताए गए। इन्हीं साक्ष्यों ने आरोपियों की भूमिका स्थापित करने में महत्वपूर्ण आधार दिया।
शुरुआत में पुलिस ने कई लोगों को आरोपी बनाया था। बाद में अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद कुलदीप साहू, चंद्रकांत चौधरी, फूल सिंह उर्फ रिंकू और आर्यन विश्वकर्मा के खिलाफ आरोप साबित हुए। वहीं दो आरोपियों सूरज साहू और निलकेश्वर साहू को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया।
किन धाराओं में दोष सिद्ध हुआ
फास्ट ट्रैक कोर्ट ने चारों दोषियों को हत्या, सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम से जुड़े अपराधों में दोषी पाया।
नाबालिग बच्ची के विरुद्ध अपराध के कारण पॉक्सो कानून के प्रावधान भी इस मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण रहे।
मामले की सुनवाई सूरजपुर फास्ट ट्रैक कोर्ट में न्यायाधीश आनंद प्रकाश वरियाल की अदालत में हुई।
अदालत ने गवाहों, वैज्ञानिक साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य प्रमाणों की जांच के बाद 29 सितंबर 2026 को चार आरोपियों को दोषी करार दिया था।
इसके बाद सजा पर फैसला 8 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।
कुलदीप का व्यवहार और अदालत की टिप्पणी
दोष सिद्ध होने के बाद मुख्य आरोपी कुलदीप साहू के व्यवहार ने भी व्यापक नाराजगी पैदा की।

रिपोर्टों के अनुसार, अदालत से बाहर निकलते समय उसने मुस्कुराते हुए इशारा किया और पत्रकारों से वीडियो बनाने के लिए कहा। इस व्यवहार को लेकर लोगों में आक्रोश बढ़ा।
सजा तय करते समय अदालत ने आरोपी के इसी रवैये पर भी टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि मुख्य आरोपी में अपने कृत्य को लेकर पश्चाताप दिखाई नहीं दिया। अदालत ने अपराध की वीभत्सता और आरोपी के व्यवहार को देखते हुए माना कि वह सभ्य समाज में लौटने योग्य नहीं है।
इस टिप्पणी का अर्थ यह था कि अदालत ने केवल अपराध की गंभीरता नहीं देखी, बल्कि यह भी देखा कि आरोपी अपने अपराध को लेकर कोई संवेदना या खेद प्रदर्शित नहीं कर रहा था।
ऐसे मामलों में अदालत अपराध की प्रकृति, पीड़ितों की स्थिति, समाज पर प्रभाव और आरोपी के सुधार की संभावना जैसे पहलुओं पर विचार करती है।
किसे कौन-सी सजा मिली
8 अक्टूबर 2026 को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सजा सुनाई।
सुरक्षा और जेल प्रशासन से जुड़ी व्यवस्थाओं के कारण यह प्रक्रिया वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कराई गई।
सजा सुनते समय अंबिकापुर जेल में मौजूद मुख्य आरोपी कुलदीप साहू के चेहरे पर भय और तनाव दिखाई देने की बात भी सामने आई।
फैसले में कुलदीप साहू, चंद्रकांत चौधरी और फूल सिंह उर्फ रिंकू को मृत्युदंड दिया गया, जबकि आर्यन विश्वकर्मा को मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
फैसले के बाद पुलिस परिवारों की प्रतिक्रिया
फैसला आने के बाद सूरजपुर के पुलिस परिवारों में राहत और संतोष का माहौल रहा। पुलिसकर्मियों तथा उनके परिवारों ने दीप जलाए और पटाखे फोड़कर खुशी जताई।
इसे पीड़ित परिवार के लिए न्याय और पुलिस जांच की सफलता के रूप में देखा गया।
यह प्रतिक्रिया उस लंबे समय की पीड़ा और आक्रोश से जुड़ी थी जो घटना के बाद से परिवार, पुलिस विभाग और स्थानीय समाज में मौजूद था।
मां और 11 वर्षीय बेटी के साथ हुई दरिंदगी ने लोगों को झकझोर दिया था, इसलिए दोषियों को कठोर सजा मिलने को न्याय की दिशा में एक अहम कदम माना गया।
सूरजपुर केस आगे की कानूनी स्थिति
फास्ट ट्रैक कोर्ट का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन मृत्युदंड के मामलों में आगे की न्यायिक प्रक्रिया भी होती है। कानून के अनुसार, फांसी की सजा को उच्च न्यायालय से पुष्टि मिलना आवश्यक होता है।
दोषियों के पास उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार भी रहेगा। इसलिए सजा का अंतिम क्रियान्वयन आगे की कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक पुष्टि के बाद ही संभव होगा।
सूरजपुर मां-बेटी हत्याकांड सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला है।
13 अक्टूबर 2024 की रात हुई इस वारदात में एक मां के साथ यौन हिंसा, मां-बेटी की निर्मम हत्या और शवों को दूर फेंके जाने जैसे आरोप सामने आए।
लगभग दो वर्ष चली जांच और सुनवाई के बाद अदालत ने चार आरोपियों को दोषी माना और तीन को फांसी, जबकि एक को मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा दी।
इस फैसले ने पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद दी है, लेकिन यह घटना समाज को यह भी याद दिलाती है कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, तेज जांच, वैज्ञानिक साक्ष्य, संवेदनशील पुलिसिंग और समयबद्ध न्याय सभी की बराबर आवश्यकता है।