जगदलपुर: विश्व प्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा का मुख्य धार्मिक चरण 618 साल पुरानी काछनगादी रस्म के साथ शुरू हुआ।
जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में पनका समाज की 12 वर्षीय बालिका पीहू दास पर काछनदेवी के आरूढ़ होने की मान्यता के साथ विशेष पूजा-अनुष्ठान किया गया।
इसके बाद देवी को बेल के तीखे कांटों से तैयार विशेष झूले पर परंपरागत विधि से झुलाया गया और बस्तर राजपरिवार को महापर्व आगे बढ़ाने की परंपरागत अनुमति दी गई।
काछनगादी रस्म क्या है?
काछनगादी बस्तर दशहरा की प्रमुख और पवित्र परंपरागत रस्मों में से एक है। इसमें एक कुंवारी कन्या को काछनदेवी का प्रतिरूप माना जाता है।
मान्यता है कि इस कन्या के माध्यम से काछनदेवी बस्तर राजपरिवार को महापर्व आगे बढ़ाने की अनुमति और आशीर्वाद देती हैं।
यह रस्म केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी प्रतीक है। इसमें बस्तर राजपरिवार, सिरहा पुजारी, पनका समाज और स्थानीय आदिवासी समुदाय की पारंपरिक भूमिका शामिल होती है।
12 वर्षीय पीहू दास बनीं देवी का प्रतिरूप
इस वर्ष काछनगादी रस्म में पनका समाज की 12 वर्षीय कुंवारी कन्या पीहू दास को चुना गया। रस्म से पहले उन्हें विशेष नियमों का पालन करना होता है, जिनमें उपवास, पवित्रता और पूजा-अनुष्ठान शामिल हैं।
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देवी के आरूढ़ होने के बाद उन्हें काछनदेवी के रूप में पूजा जाता है।
रस्म के दौरान सिरहा पुजारी और पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार पीहू दास को बेल के कांटों से बने झूले पर बैठाकर झुलाया गया। श्रद्धालु इसे देवी के आशीर्वाद का प्रतीक मानते हैं और बस्तर राजपरिवार के सदस्य दशहरा आयोजन आगे बढ़ाने के लिए अनुमति लेते हैं।
बेल के कांटों का झूला क्यों?
बेल के कांटों का झूला काछनगादी रस्म का केंद्रीय प्रतीक है। मान्यता है कि कांटों पर झूलना जीवन की कठिनाइयों, बाधाओं और संकटों को पार करने का प्रतीक है।
यह दर्शाता है कि बड़े पर्व या कार्य को शुरू करने से पहले तप, संयम और देवी कृपा की आवश्यकता होती है।
इस झूले को तैयार करने की जिम्मेदारी पीढ़ियों से एक विशेष परिवार को मिली हुई है। बताया जाता है कि लामनी के नेताम परिवार की 22 पीढ़ियां बेल कांटों का झूला बनाने की परंपरा निभा रही हैं।
618 साल पुरानी परंपरा का इतिहास

बस्तर दशहरा की परंपरा लगभग 618 वर्षों से चली आ रही है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार रथयात्रा की शुरुआत सन् 1408 ई. के आसपास मानी जाती है।
यह उत्सव केवल राम-रावण कथा पर आधारित नहीं है, बल्कि बस्तर की स्थानीय देवी-देवताओं, आदिवासी परंपराओं और राजवंशीय विधानों का संगम है।
बस्तर दशहरा का केंद्र दंतेश्वरी देवी हैं, जिन्हें बस्तर की आराध्य देवी माना जाता है। यही कारण है कि यहां रावण दहन की परंपरा नहीं है। इसके बजाय देवी-देवताओं के रथ की परिक्रमा और देवी से जुड़े अनुष्ठानों को विशेष महत्व दिया जाता है।
काछनदेवी से अनुमति क्यों?
बस्तर राजपरिवार हर वर्ष दशहरा आगे बढ़ाने से पहले काछनदेवी से आशीर्वाद और अनुमति लेता है। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित है कि देवी की अनुमति के बिना महापर्व का आगे का चरण शुरू नहीं किया जाना चाहिए।
काछनगादी रस्म पूरी होने के बाद ही रथ निर्माण, रथयात्रा और अन्य धार्मिक आयोजन आगे बढ़ते हैं।
काछनदेवी को बस्तर की रक्षा और कल्याण से जोड़ा जाता है। उनकी पूजा के बाद राजपरिवार को यह विश्वास होता है कि पर्व बिना किसी बाधा के संपन्न होगा और क्षेत्र में सुख-शांति बनी रहेगी।
75 दिनों तक चलेगा महापर्व
बस्तर दशहरा 2026 की शुरुआत 12 अगस्त को हरेली अमावस्या पर पाट जात्रा पूजा विधान के साथ हुई थी। काछनगादी रस्म के बाद महापर्व का मुख्य धार्मिक चरण शुरू हुआ है।
यह दुनिया के सबसे लंबे दशहरा उत्सवों में से एक है और लगभग 75 दिनों तक चलता है।
– पाट जात्रा: जंगल से पवित्र लकड़ी लाकर रथ निर्माण की शुरुआत।
– रथ निर्माण और रथयात्रा: देवी के रथ का निर्माण और उसकी परिक्रमा।
– मुरिया दरबार: आदिवासी समाज की पारंपरिक भागीदारी और अनुष्ठान।
– नंदी जात्रा और मावली पर्व: देवी-देवताओं और स्थानीय समुदायों से जुड़े आयोजन।
-मावली माता की डोली विदाई: दशहरा के अंतिम चरण में माता को विदाई देने की रस्म।
बस्तर दशहरा 2026 का समापन 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली विदाई पूजा विधान के साथ होगा।
बस्तर में सांस्कृतिक महत्व
काछनगादी रस्म केवल धार्मिक मान्यता नहीं है, बल्कि यह बस्तर की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर भी है। इसमें आदिवासी समाज, पनका समाज, पुजारी परंपरा और राजपरिवार की साझी भागीदारी दिखती है।
यही कारण है कि इसे भारत की सबसे अनूठी और समावेशी दशहरा परंपराओं में गिना जाता है।
हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस अद्भुत रस्म को देखने जगदलपुर पहुंचते हैं। कांटों के झूले पर झूलती कन्या, देवी का आरूढ़ होना और राजपरिवार की परंपरागत पूजा इस महापर्व की पहचान बन चुकी है।