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सुनील आंबेकर की दोटूक: क्या आजादी के बाद की राजनीति ही असंतुलन की वजह हैं?

30 September 2026
KharunTimes

सुनील आंबेकर : ऐसे समय में जब देश का राजनीतिक परिदृश्य मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और जनगणना की प्रक्रियाओं से गरमाया हुआ है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने एक बार फिर पूरे देश में ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (NRC) लागू करने की पुरजोर पैरवी की है।

संघ का स्पष्ट मानना है कि देश की “एकता, अखंडता और सुरक्षा” की रक्षा करने के साथ-साथ “जनसांख्यिकीय असंतुलन” (Population Imbalance) की समस्या से निपटने के लिए वास्तविक नागरिकों की पहचान करना अत्यंत आवश्यक है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इस पूरे विषय को देश की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक संदर्भों से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।

उनके इस वक्तव्य ने न केवल नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी के अंतर-संबंधों को स्पष्ट किया, बल्कि आजादी के बाद से अब तक रही सरकारी नीतियों की समीक्षा का एक नया द्वार भी खोल दिया।

सुनील आंबेकर का केंद्रबिंदु

सुनील आंबेकर के संबोधन का मुख्य केंद्र बिंदु मतदाता सूचियों में हुई गड़बड़ियों को सुधारना और पड़ोसी देशों से आए पीड़ित अल्पसंख्यकों को न्याय दिलाना रहा।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो लोग “गलत तरीके से” मतदाता सूची में शामिल कर लिए गए हैं, उन्हें चिन्हित किया जाना अनिवार्य है।

इसके साथ ही, पड़ोसी देशों से भारत आए लोगों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत नागरिकता सुनिश्चित करना समय की मांग है।

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आंबेकर के अनुसार, जब भी जनसांख्यिकीय असंतुलन के समाधान की बात होती है, तब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की आवश्यकता सामने आती है।

उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए याद दिलाया कि 1947 में भारत का विभाजन जनसांख्यिकीय असंतुलन के कारण ही हुआ था।

1947 के बाद जो पड़ोसी देश ‘इस्लामिक राष्ट्र’ बने, वहां छूट गए बहुसंख्यक लोग अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से थे, जो लगातार धार्मिक उत्पीड़न का सामना करते रहे।

ऐसे में जो लोग वहां से भारत लौटे हैं, उन्हें सीएए के माध्यम से नागरिकता देना और एनआरसी के जरिए ऐसे लोगों की पहचान करना अनिवार्य प्रक्रिया है।

यदि इस प्रक्रिया में किसी को आपत्ति होती है, तो उसका समाधान अदालतों सहित मौजूद कानूनी तंत्र के माध्यम से किया जा सकता है।

लेकिन राजनीतिक कारणों से किसी गैर-नागरिक को नागरिक के रूप में स्वीकार कर लेना पूरी तरह से गलत है।

विभाजन का इतिहास और सांस्कृतिक पहचान

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए आंबेकर ने जनसांख्यिकीय बदलाव को केवल एक प्रशासनिक मुद्दा मानने के बजाय इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्तित्व से जोड़ा।

उन्होंने तर्क दिया कि भारत में जनसांख्यिकीय परिवर्तन का इतिहास काफी पुराना है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम आक्रमणों के साथ हुई थी।

चूंकि 1947 में देश का विभाजन धर्म और आबादी के आधार पर हुआ था, इसलिए भारत के लिए जनसंख्या का संतुलन बनाए रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर बल देते हुए उन्होंने कहा:

“हर राष्ट्र की अपनी एक विशिष्ट पहचान होती है। यदि उन लोगों की जनसंख्या संतुलन में बनी रहती है जो इस देश की संस्कृति को अपना मानते हैं, तभी देश की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह सकती है।”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की मूल संस्कृति को बचाने के इस प्रयास को किसी भी स्थिति में ‘साम्प्रदायिक’ (Communal) करार नहीं दिया जा सकता।

नीतिगत विफलताएं, धर्मनिरपेक्षता का ढांचा और असमान कानून

सुनील आंबेकर ने आजादी के बाद की सरकारों की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि वे जनसंख्या और जनगणना को लेकर कोई “ठोस नीति” बनाने में विफल रहीं।

उन्होंने कहा कि आपातकाल (Emergency) से पहले जनसंख्या नियंत्रण को ही समस्याओं का एकमात्र समाधान मानकर पेश किया जाता रहा, जबकि एक व्यापक जनसंख्या नीति तब तक नहीं बन सकी जब तक कि 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन नहीं हुआ।

इसके अलावा, आंबेकर ने जनसांख्यिकीय असंतुलन के लिए आजादी के बाद लागू किए गए कानूनी ढांचे में मौजूद अंतर को जिम्मेदार ठहराया।

उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बनाई गई नीतियों पर सवाल उठाते हुए इन बिंदुओं को भी रेखांकित किया:

विवाह कानूनों में विषमता:

स्वतंत्रता के बाद समान विवाह कानून लागू नहीं किया गया। जहां एक तरफ हिंदुओं के लिए एक से अधिक विवाह को दंडनीय अपराध बना दिया गया, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों को चार विवाह करने की अनुमति दी गई जबकि स्वतंत्रता से पूर्व ऐसा कोई कानून अस्तित्व में नहीं था।

संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या:

शैक्षणिक संस्थानों से संबंधित अनुच्छेद 29 और 30 की व्याख्या और स्थानीय निकाय चुनावों में लागू जनसंख्या नियंत्रण के नियमों ने भी असमानताओं को बढ़ावा दिया।

अवैध घुसपैठ और आईएमडीटी कानून:

असम में लंबे आंदोलन के बाद उच्चतम न्यायालय द्वारा रद्द किए गए ‘अवैध प्रवासी (अधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983’ (IMDT Act) का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अवैध घुसपैठ को नजरअंदाज करना तत्कालीन नीति का हिस्सा बन गया था।

संघ का दीर्घकालिक रुख और बदलता राजनीतिक परिदृश्य

राष्ट्रव्यापी एनआरसी को लेकर संघ का यह रुख नया नहीं है, बल्कि वह वर्षों से इस मांग पर कायम रहा है:

वर्ष 2019: संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह सुरेश ‘भैयाजी’ जोशी ने कहा था कि जो लोग भारत के नागरिक नहीं हैं, उनकी पहचान के लिए एनआरसी तैयार करना सरकार की जिम्मेदारी है।

वर्ष 2021: आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया था कि एनआरसी का उद्देश्य वास्तविक नागरिकों की पहचान करना है और इसे हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

हालांकि, 2019-20 में सीएए और प्रस्तावित एनआरसी के खिलाफ हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक एजेंडे से थोड़ा पीछे हट गया था।

दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया था कि सत्ता में आने के बाद से उनकी सरकार ने एनआरसी पर चर्चा नहीं की है, और इसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी इसे अपने 2024 के चुनाव घोषणापत्र में शामिल नहीं किया।

वर्तमान जनगणना, एनपीआर और कानूनी वास्तविकता

हालिया समय में जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही एनआरसी का मुद्दा एक बार फिर प्रासंगिक हो उठा है।

वर्तमान जनगणना प्रश्नावली में कई ऐसे प्रश्न शामिल किए गए हैं जो 2020 के राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) के शेड्यूल का हिस्सा थे।

जैसे – नागरिकता, माता-पिता का विवरण, आधार (Aadhaar) और वोटर आईडी।

कानूनी और वैधानिक ढांचे के अनुसार, ‘राष्ट्रीय भारतीय नागरिक रजिस्टर’ (NRIC) तैयार करने के लिए जनसंख्या रजिस्टर के सत्यापन का प्रावधान मौजूद है, जिसमें उन मामलों की पहचान की जा सकती है जहां नागरिकता संदिग्ध मानी जाती है।

हालांकि, वर्तमान में स्थिति यह है कि सरकार की ओर से राष्ट्रव्यापी एनआरसी लागू करने के संबंध में कोई औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है।

2021 की जनगणना के साथ प्रस्तावित एनपीआर अभ्यास को कोविड-19 महामारी के दौरान स्थगित कर दिया गया था, और जब जनगणना प्रक्रिया पुनर्जीवित हुई, तो एनपीआर को पुनः अधिसूचित नहीं किया गया।

इसके बावजूद, सुनील आंबेकर का बयान यह दर्शाता है कि संघ के वैचारिक रोडमैप में देश की सुरक्षा, संस्कृति और जनसांख्यिकीय संतुलन के लिए एनआरसी आज भी एक अनिवार्य स्तंभ बना हुआ है।

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Laxya Sahu
About the author

Laxya Sahu

लक्ष्य साहू मूलतः नया रायपुर के अभनपुर के निवासी हैं। वे खारुन टाइम्स के प्रधान संपादक हैं तथा सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन करते हैं । उनकी कृति "चार समाज की बात" समकालीन सामाजिक सरोकारों पर आधारित है । छात्र जीवन से ही वे सामाजिक एवं छात्र हित के मुद्दों से जुड़े रहे हैं , इस दौरान उन्होंने अनेक छात्र एवं जनहित संबंधी आंदोलनों को खड़ा कर उनका नेतृत्व किया तथा लगभग आठ वर्षों तक विद्यार्थियों के विकास के उद्देश्य से शैक्षणिक, सामाजिक और नेतृत्व विकास कार्यक्रमों का आयोजन एवं संचालन किया। वर्तमान में वे पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर नियमित कार्य कर रहे हैं।

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