एक वोटर लिस्ट से शुरू हुई कहानी कैसे पहुंची चुनाव आयोग के तीन सदस्यों के बीच मतभेद, सॉफ्टवेयर की ताकत और लोकतंत्र की विश्वसनीयता के सवाल तक?
कल्पना कीजिए कि आप 18 साल के हुए हैं।
आप पहली बार वोट देने जा रहे हैं। आपके हाथ में Form 6 है। आप अपना नाम, पता, उम्र और बाकी जानकारी भरते हैं।
आपको लगता है कि यह एक सीधी-सी प्रशासनिक प्रक्रिया होगी फॉर्म भरिए और मतदाता बन जाइए।
लेकिन एक सवाल आता है।
क्या आपका नाम, आपके माता-पिता का नाम या आपके दादा-दादी का नाम 2000 के आसपास हुई पिछली Special Intensive Revision यानी SIR की मतदाता सूची में था?
आप सोचते हैं इसका मेरे वोटर बनने से क्या संबंध?
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और यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है।
क्योंकि इसी Form 6 में किए गए बदलाव को लेकर चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की। और यह कोई सामान्य आपत्ति नहीं थी।
The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।
सवाल सिर्फ यह नहीं था कि किसी फॉर्म में एक नया कॉलम क्यों आया।
सवाल इससे बड़ा था-
क्या चुनाव आयोग के भीतर लिए जा रहे महत्वपूर्ण फैसलों में उसके सभी सदस्य बराबर तरीके से शामिल थे?
और फिर कहानी में एक दूसरा किरदार सामने आता है सॉफ्टवेयर !
एक ऐसा सॉफ्टवेयर जिसके जरिए करोड़ों मतदाताओं का रिकॉर्ड संभाला जाता है।
गोवा में 97 ऐसे मतदाताओं का मामला सामने आया जिन्हें स्थानीय Electoral Registration Officers ने पात्र माना, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक सिस्टम उन्हें अंतिम मतदाता सूची में वापस जोड़ने की अनुमति नहीं दे रहा था।
14 आपत्तियां आखिर क्यों महत्वपूर्ण हैं?
The Indian Express की 23 सितंबर 2026 की जांच ने इस विवाद को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार अलग-अलग फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की। इनमें कुछ आपत्तियां एक ही दिन में चार बार तक दर्ज की गईं।
इन आपत्तियों का दायरा भी छोटा नहीं था।
मामला था-
- नए मतदाताओं के पंजीकरण का,
- मतदाता नाम हटाने और बहाल करने का,
- Form 6 में बदलाव का,
- SIR से जुड़े फैसलों का,
- voter database की पहुंच और नियंत्रण का,
- और चुनावी डेटा संभालने वाले IT systems का
यानी विवाद चुनाव आयोग के किसी एक कमरे या किसी एक फाइल तक सीमित नहीं दिखता।
यह सीधे उस प्रक्रिया तक पहुंचता है जिसके जरिए तय होता है कि कौन मतदाता सूची में है और कौन नहीं !
लेकिन यहां एक जरूरी कानूनी बारीकी समझनी होगी।
यह कहना कि “दो चुनाव आयुक्तों को वोटिंग से बाहर कर दिया गया” अपने आप में कानूनी निष्कर्ष नहीं है।
2023 के कानून के तहत आयोग का काम, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से होता है और मतभेद होने पर बहुमत का फैसला लागू होता है।
इसलिए किसी Commissioner की dissenting note अपने आप में आयोग के अंतिम फैसले को अवैध साबित नहीं करती।
असल सवाल यह है कि –
क्या ये dissenting notes केवल सामान्य संस्थागत बहस थीं, या वे ऐसी प्रशासनिक समस्याओं की ओर इशारा कर रही थीं जिनका असर मतदाता सूची पर पड़ा?
यही वह बिंदु है जहां कहानी गंभीर हो जाती है।
13 करोड़ नाम- लेकिन इस संख्या को समझना जरूरी है
“13 करोड़ वोटर डिलीट हो गए।”
राजनीतिक बहस में यह वाक्य बहुत तेजी से फैल सकता है।
लेकिन वास्तविकता समझने के लिए यहीं रुकना पड़ता है।
The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के draft electoral rolls में 13 करोड़ से अधिक नाम कम हुए हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि 13 करोड़ लोगों का अंतिम रूप से वोट देने का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
Draft roll और final electoral roll अलग-अलग चरण हैं।
SIR का घोषित उद्देश्य electoral rolls की जांच और उन्हें अपडेट करना है।
प्रक्रिया में मृत व्यक्तियों, duplicate entries, स्थान बदल चुके लोगों और अन्य अयोग्य प्रविष्टियों की पहचान जैसे कारण शामिल हो सकते हैं।
लेकिन संख्या फिर भी असाधारण है।
दिल्ली में, उदाहरण के लिए, उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार pre-SIR electoral roll में लगभग 1.45 करोड़ electors थे, जबकि draft roll में यह संख्या करीब 97.53 लाख रह गई। महाराष्ट्र में यह संख्या लगभग 9.78 करोड़ से घटकर 7.71 करोड़ हुई।
इसलिए असली सवाल “13 करोड़ वोट चोरी हो गए?” नहीं है।
सवाल है-
इन करोड़ों नामों में से कितने नाम किस कारण हटे? कितने लोगों को notice मिला? कितनों ने claim और objection दाखिल किया? कितने नाम वापस जोड़े गए? और क्या हर eligible citizen के लिए correction की प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से खुली रही ?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब SIR की विश्वसनीयता तय करेगा।
कहानी में Form 6 क्यों आया?
Form 6 कोई मामूली कागज नहीं है।
यह वह statutory form है जिसके जरिए कोई व्यक्ति पहली बार electoral roll में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है।
The Indian Express की जांच के मुताबिक, ECINet portal पर Form 6 में एक नया declaration दिखाई दिया।
आवेदक से पूछा गया कि क्या उसका नाम या उसके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली SIR की electoral roll में था।
ऊपर से देखा जाए तो यह सिर्फ verification का अतिरिक्त सवाल लग सकता है।
लेकिन विवाद यहां शुरू हुआ कि,
अगर सवाल optional था, तो बिना उसका जवाब दिए form आगे क्यों नहीं बढ़ता था?
The Indian Express ने रिपोर्ट किया कि section mandatory mark नहीं था, लेकिन applicants उसके जवाब के बिना form submit नहीं कर पा रहे थे।
इसी पर Election Commissioners Joshi और Sandhu ने आपत्ति दर्ज की।
रिपोर्ट के अनुसार, Joshi ने मई में सवाल उठाया कि statutory Form 6 को Registration of Electors Rules, 1960 में बदलाव किए बिना बदला नहीं जा सकता।
बाद में Sandhu ने भी इसे “unauthorised” और “illegal” बताते हुए बदलाव हटाने की मांग की।
यहां भी शब्दों का महत्व है।
“Illegal” ECI का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं था।
यह दो Election Commissioners की recorded objection में इस्तेमाल किया गया वर्णन था।
यानी तथ्य यह है कि ऐसी आपत्ति दर्ज हुई।
यह अलग प्रश्न है कि अदालत या सक्षम प्राधिकारी अंततः उस बदलाव को कानूनन वैध मानता है या नहीं।
और यही फर्क एक गंभीर सवाल को राजनीतिक आरोप से अलग करता है।
जब लोकतंत्र का फैसला स्क्रीन पर अटक जाए
अब कहानी को दिल्ली से गोवा ले चलते हैं।
यहां 97 मतदाताओं का मामला सामने आता है।
The Indian Express की दूसरी जांच के अनुसार, Goa में Electoral Registration Officers ने इन 97 लोगों की eligibility पर सुनवाई की और उन्हें eligible माना।
लेकिन final electoral roll में ये नाम फिर भी नहीं आए।
रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने सिस्टम के जरिए इन्हें restore करने की कोशिश की और सात दिनों में आठ emails तक भेजे, लेकिन software में ऐसी तकनीकी बाधा थी कि अधिकारी अपने निर्णय को सिस्टम में प्रभावी ढंग से दर्ज नहीं कर पा रहे थे।
यहां कहानी अचानक बहुत मानवीय हो जाती है।
क्योंकि “97” सुनने में छोटा आंकड़ा लगता है।
लेकिन लोकतंत्र में किसी नागरिक के लिए उसका नाम 1 करोड़ लोगों की सूची में 97वां नाम नहीं होता।
वह उसका एकमात्र नाम होता है।
वह नाम अगर सूची में नहीं है तो वह व्यक्ति चुनाव के दिन बूथ पर जाकर अपनी पहचान साबित करने के बावजूद मतदान नहीं कर सकता।
और Goa मामले की यही सबसे महत्वपूर्ण बात है-
स्थानीय अधिकारी ने पात्र माना, लेकिन सिस्टम उस निर्णय को लागू नहीं कर पाया ,
इससे बड़ा संस्थागत सवाल पैदा होता है:
अगर कानून किसी स्थानीय electoral officer को निर्णय लेने की शक्ति देता है, तो क्या software architecture उस शक्ति को सीमित कर सकता है?
यदि जवाब हां है, तो फिर software केवल सुविधा नहीं रहा।
वह प्रशासनिक शक्ति का हिस्सा बन गया।
असली लड़ाई दिल्ली बनाम राज्य नहीं, “कंट्रोल” की है
Election Commission आज केवल फाइलों और कागजों पर नहीं चलता।
मतदाता सूची का विशाल हिस्सा digital systems के जरिए manage होता है।
ERONet electoral-roll related work के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि ECINet विभिन्न election-related services को एक integrated digital platform पर लाने की दिशा में विकसित किया गया है।
यहीं से Sandhu और Joshi की एक और आपत्ति सामने आती है।
The Indian Express के अनुसार, दोनों Commissioners ने voter database और IT infrastructure में बढ़ते centralisation पर सवाल उठाया और Cabinet Secretary “T V Somanathan” को भी पत्र लिखा।
चिंता यह थी कि state-level officials को voter-roll systems पर पूरा access न मिल पाने से निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
ध्यान दीजिए यह केवल “Delhi vs states” का मामला नहीं है।
असल प्रश्न है:
किसके पास data बदलने की क्षमता है?
और उससे भी महत्वपूर्ण-
क्या हर बदलाव का audit trail है?
किस अधिकारी ने नाम हटाया?
किस अधिकारी ने वापस जोड़ा?
किस स्तर पर निर्णय बदला?
किसने access दिया?
किसने access रोका?
और अगर software ने किसी अधिकारी के निर्णय को लागू नहीं होने दिया, तो उस निर्णय की जवाबदेही किसकी होगी?
एक आधुनिक electoral system के लिए ये तकनीकी सवाल नहीं हैं।
ये लोकतांत्रिक accountability के सवाल हैं।
चुनाव आयोग का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है
अब यहां रुकना जरूरी है।
क्योंकि पूरी कहानी केवल dissenting Commissioners के version पर नहीं टिक सकती।
चुनाव आयोग ने रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि internal notes, observations, suggestions और differing views किसी multi-member institution की सामान्य decision-making process का हिस्सा हैं।
आयोग का कहना है कि केवल कुछ internal notes को सामने रखकर पूरी प्रक्रिया का आकलन करना “one part of the picture” देखने जैसा है।
आयोग ने यह भी कहा कि महत्वपूर्ण निर्णय और orders आवश्यक institutional approval के साथ लिए गए और उसके निर्णय unanimous रहे।
यानी दो तस्वीरें हमारे सामने हैं।
पहली तस्वीर:
दो Commissioners कहते हैं हमने महत्वपूर्ण फैसलों पर बार-बार आपत्ति दर्ज की।
दूसरी तस्वीर:
ECI कहता है , ये internal deliberations का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले संस्थागत प्रक्रिया के अनुसार हुए।
फिर सवाल “14” का नहीं, “14 के बाद क्या हुआ?” का है
यह शायद इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
किसी लोकतांत्रिक संस्था में असहमति होना अपने आप में संकट नहीं है।
बल्कि असहमति कभी-कभी संस्था के भीतर मौजूद checks and balances का संकेत भी हो सकता है।
संकट तब पैदा होता है जब जनता यह न समझ पाए कि असहमति के बाद हुआ क्या।
अगर Commissioner ने कहा कि कोई बदलाव statutory rules से बाहर है-
तो उस objection पर अंतिम निर्णय क्या हुआ?
अगर किसी ने कहा कि software access पर्याप्त नहीं है-
तो audit हुआ या नहीं?
अगर 97 voters के बारे में स्थानीय अधिकारियों ने eligibility तय की-
तो software ने उस निर्णय को क्यों नहीं माना?
अगर Form 6 में नया declaration जोड़ा गया-
तो उसका statutory basis क्या था?
और अगर ECI कहता है कि सभी अंतिम निर्णय unanimous थे-
तो dissenting notes और final orders के बीच का अंतर सार्वजनिक रूप से कितना स्पष्ट है?
यही transparency का वास्तविक परीक्षण है।
पश्चिम बंगाल और SIR की दूसरी परत
SIR विवाद केवल Form 6 या Goa के 97 मतदाताओं तक सीमित नहीं है।
The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, West Bengal में electoral-roll decisions के खिलाफ appeals और उनसे जुड़ी judicial proceedings भी Commissioners के objections के दायरे में आईं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि Sandhu ने सवाल उठाया कि ECI की ओर से कुछ appeals किस authority से दाखिल की गईं, जबकि संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी।
यहां भी एक सावधानी जरूरी है।
इससे यह निष्कर्ष निकालना कि “अदालत ने 27 लाख लोगों को गलत तरीके से वोटर लिस्ट से हटा दिया” सीधे स्थापित नहीं होता।
इस तरह के आंकड़ों और न्यायिक प्रक्रिया को case-by-case देखना होगा।
यानी SIR पर बहस का अगला चरण राजनीतिक नारों से ज्यादा documents, orders, notices और appeal records पर निर्भर करेगा।
फिर CJP मैदान में क्यों आया ?
23 सितंबर की रिपोर्ट के बाद विवाद राजनीतिक गलियारों से सड़क तक पहुंचा।
और 24 सितंबर को Cockroach Janta Party यानी CJP ने CEC Gyanesh Kumar से 48 घंटे में इस्तीफा देने की मांग की।
पार्टी के Abhijeet Dipke, Saurav Das और Ashutosh Ranka ने nationwide agitation और “Election Commission Thik Karo” campaign की घोषणा की।
CJP ने SIR को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए और आने वाले चुनावों को रोकने जैसी मांगें भी रखीं। ये CJP के राजनीतिक आरोप और मांगें हैं, स्थापित तथ्य नहीं।
इसी तरह विपक्षी नेताओं ने भी Gyanesh Kumar पर सवाल उठाए और उनके इस्तीफे की मांग की।
लेकिन यहां राजनीतिक आरोप को evidence नहीं कहा जा सकता।
किसी नेता का “vote theft” कहना एक राजनीतिक statement है।
किसी Election Commissioner का written objection एक institutional record है।
किसी court order का होना judicial record है।
और final electoral roll एक administrative record है।
इन चारों को एक ही श्रेणी में रख देना पूरी समझ को ही धुंधला कर देता है।
आखिर Gyanesh Kumar कौन हैं?
विवाद के केंद्र में मौजूद Gyanesh Kumar 1988-batch Kerala cadre के IAS अधिकारी हैं।
Election Commission की आधिकारिक biography के अनुसार, उन्होंने IIT Kanpur से Civil Engineering में B.Tech किया और Business Finance तथा Environmental Economics की पढ़ाई की।
केंद्र सरकार में वे Ministry of Home Affairs समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे और 15 मार्च 2024 को Election Commissioner नियुक्त हुए।
19 फरवरी 2025 को उन्होंने भारत के 26वें Chief Election Commissioner के रूप में कार्यभार संभाला।
The Indian Express ने उनकी नौकरशाही पृष्ठभूमि में Jammu & Kashmir reorganisation और Ram Janmabhoomi trust से जुड़े सरकारी कामों का भी उल्लेख किया है।
यह प्रोफाइल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की बहस केवल किसी व्यक्ति के बारे में नहीं है।
यह उस संस्था के बारे में है जिसकी अध्यक्षता वह कर रहे हैं।
तो असली सवाल क्या है?
क्या चुनाव आयोग में मतभेद होना असामान्य है?
नहीं।
क्या dissent अपने आप किसी फैसले को अवैध साबित करता है?
नहीं।
क्या 13 करोड़ नामों की draft-roll कमी को सीधे “13 करोड़ वोट चोरी” कहना तथ्यात्मक रूप से सही है?
नहीं- क्योंकि draft और final roll अलग चरण हैं।
क्या 97 Goa voters का मामला महत्वहीन है क्योंकि संख्या छोटी है?
नहीं। यदि किसी eligible voter को procedural या technical कारण से final roll में शामिल नहीं किया जा सका, तो वह electoral administration के लिए गंभीर प्रश्न है।
क्या Form 6 को लेकर दो Commissioners ने लिखित आपत्ति की?
हां, The Indian Express की जांच के अनुसार।
क्या Election Commission ने कहा कि ये मतभेद सामान्य internal deliberation का हिस्सा हैं?
हां।
क्या CJP ने 48 घंटे में CEC के इस्तीफे की मांग की?
हां। लेकिन यह CJP की राजनीतिक मांग है, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
सबसे बड़ा सवाल: वोटर लिस्ट कौन बनाता है ?
यहीं आकर पूरी कहानी एक नए अर्थ में बदल जाती है।
लोकतंत्र को हम अक्सर चुनाव के दिन देखते हैं।
एक EVM, एक बूथ, एक मतदाता और एक वोट।
लेकिन चुनाव की असली शुरुआत उससे बहुत पहले होती है।
वह उस database से शुरू होती है जिसमें आपका नाम है।
अगर नाम है- आप वोट दे सकते हैं।
अगर नाम नहीं है- आपका वोट उस दिन अस्तित्व में ही नहीं आता।
इसलिए electoral roll केवल प्रशासनिक register नहीं है।
यह नागरिक और लोकतंत्र के बीच प्रवेश-द्वार है।
और जब वह प्रवेश-द्वार digital हो जाता है, तो transparency की परिभाषा भी बदलनी पड़ती है।
अब केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि “नाम क्यों हटाया गया।”
यह भी बताना होगा-
किस सिस्टम ने हटाया? किस authority ने approve किया? किस officer ने access किया? किस स्तर पर correction संभव था? और अगर सिस्टम ने कोई गलती की, तो उसे किसने सुधारा?
Goa के 97 लोगों की कहानी इसलिए बड़ी है।
क्योंकि वह हमें 13 करोड़ की संख्या के पीछे छिपे एक व्यक्ति का चेहरा दिखाती है।
लोकतंत्र का भरोसा संख्या से नहीं, प्रक्रिया से बनता है
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद 14 objections भी नहीं हैं।
न ही केवल 13 करोड़ का आंकड़ा।
न CJP का 48 घंटे का ultimatum।
सबसे बड़ा प्रश्न है क्या जनता चुनावी प्रक्रिया को समझ सकती है, उसकी जांच कर सकती है और उसके निर्णयों पर भरोसा कर सकती है?
अगर Election Commission के भीतर disagreement हुआ है, तो उसका पूरा institutional record सामने आना चाहिए।
अगर Form 6 बदला गया है, तो उसका legal basis स्पष्ट होना चाहिए।
अगर voter database को centralise किया गया है, तो access, audit और accountability की व्यवस्था सार्वजनिक रूप से समझाई जानी चाहिए।
अगर 97 eligible Goa voters software की वजह से final roll में नहीं आ सके, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि technical failure कैसे हुआ और corrective mechanism क्या था।
और अगर 13 करोड़ से अधिक नाम draft rolls में कम हुए हैं, तो प्रत्येक राज्य के स्तर पर यह पारदर्शी होना चाहिए कि वे नाम किन श्रेणियों में गए और कितने नाम claims और objections के बाद वापस जुड़े।
यही वह जगह है जहां राजनीतिक शोर और संस्थागत जवाबदेही अलग-अलग रास्ते लेते हैं।
किसी दल का आरोप अंतिम सत्य नहीं।
किसी अधिकारी की आपत्ति अंतिम न्यायिक फैसला नहीं।
और किसी संस्था का press statement भी जांच का विकल्प नहीं।
अंतिम भरोसा बनता है रिकॉर्ड से।
फाइल से।
कानून से।
Audit trail से।
और उस मतदाता के नाम से, जो चुनाव के दिन सिर्फ इतना जानना चाहता है-
“क्या मेरा नाम सूची में है?”
यही इस पूरे किस्से का सबसे सरल और शायद सबसे कठिन सवाल है।
क्योंकि लोकतंत्र में करोड़ों की सूची आखिरकार एक-एक नाम से ही बनती है।
और जब किसी एक नाम पर सिस्टम रुक जाता है, तो सवाल सिर्फ उस नागरिक का नहीं रहता।
वह पूरे सिस्टम से पूछा जाने लगता है।