पोरा तिहार : भादो की अमावस्या पर छत्तीसगढ़ के गांवों की सुबह कुछ अलग होती है।
खेतों में खड़ी धान की फसल, घर के आंगन में सजे मिट्टी के नांदिया-बैला और खूंटे पर बंधे सजे-धजे बैल—हर दृश्य खेती और गांव की पुरानी स्मृतियों से जुड़ा नजर आता है।
यही वह दिन है जब किसान अपने पशुधन के प्रति सम्मान जताते हैं, घरों में पारंपरिक पकवान बनते हैं और बच्चे मिट्टी के खिलौनों के साथ अपनी दुनिया सजाते हैं।
शाम होते-होते गांव के चौक-मैदान में खेल, मेल-मिलाप और लोकधुनों का रंग चढ़ने लगता है।
पोरा का अर्थ क्या है?
छत्तीसगढ़ में प्रचलित लोकव्याख्या के अनुसार ‘पोरा’ का संबंध धान में पोर फूटने या दाना भरने की अवस्था से है।
यानी खेत में धान की बालियों में दूध भरने ( यानी जब धान की बालियों में दाने बनने लगते हैं और उनके भीतर दूध जैसा सफेद पदार्थ भरने लगता है, उस अवस्था को ‘दूध भरना’ कहा जाता है। आगे चलकर यही दाना पककर चावल बनता है।)
और फसल के आगे बढ़ने के समय को पोरा से जोड़ा जाता है। इसी वजह से इसे खेती के महत्वपूर्ण पड़ाव से जुड़ा तिहार माना जाता है।
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खेत में फसल के इस महत्वपूर्ण पड़ाव को ग्रामीण जीवन में शुभ समय माना गया और इसी कृषि चक्र से इस तिहार की पहचान जुड़ गई।
किसकी पूजा होती है?
सुबह बैलों को नहलाया जाता है, उनके सींगों और शरीर को सजाया जाता है, गले में घंटियां या घुंघरू बांधे जाते हैं और फिर विधि-विधान से पूजा की जाती है।
कई घरों में मिट्टी से बने नांदिया-बैला, जांता और पोरा भी पूजा का हिस्सा होते हैं।
कुछ परंपराओं में भगवान शिव-पार्वती और नंदी की आराधना का भी उल्लेख मिलता है।
यह पूजा केवल धार्मिक रस्म नहीं है। जिस पशुधन के सहारे खेती का काम पीढ़ियों तक चलता रहा, उसके प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने का यह ग्रामीण तरीका भी है।
पूजा में क्या चढ़ता है?
इस दिन घर की रसोई भी उत्सव का अहम हिस्सा बन जाती है।
कई परिवारों में ठेठरी, खुरमी, चीला, बरा, सोंहारी, अईरसा और गुलगुला जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।
पूजा के बाद इनका प्रसाद बांटा जाता है।
इस तरह आंगन में मिट्टी के खिलौने, बाहर सजा पशुधन और रसोई से आती पकवानों की खुशबू तीनों मिलकर दिन को खास बना देते हैं।
पोरा पटकना क्या है?
शाम का समय इस तिहार को और जीवंत बना देता है।
कई इलाकों में ‘पोरा पटकना’ की परंपरा है।
बच्चे और युवा मिट्टी के खिलौने लेकर गांव के बाहर मैदान, चौक या किसी निर्धारित स्थान पर पहुंचते हैं और वहां उन्हें पटकने की रस्म निभाते हैं।
इसके बाद खेल-कूद शुरू होता है, कहीं कबड्डी और खो-खो की टोली बनती है, तो कहीं दूसरे पारंपरिक खेलों के जरिए गांव के लोग एक साथ समय बिताते हैं।
सुबह का पूजा-पाठ और शाम का यह सामूहिक उल्लास दिन को एक पूरे ग्रामीण उत्सव में बदल देता है।
बच्चों के लिए मिट्टी का बैल क्यों खास है?
बाजारों में इन दिनों कुम्हारों के बनाए मिट्टी के नांदिया-बैला, जांता, चूल्हा, हंडी और गृहस्थी के छोटे-छोटे सामान सज जाते हैं।
बच्चे इन्हें खिलौनों की तरह घर लाते हैं, वे मिट्टी के बैल सजाते हैं, जांता-पोरा से खेलते हैं और अपने छोटे से खेल में वही ग्रामीण जीवन दोहराते हैं जिसे वे अपने आसपास देखते आए हैं।
मिट्टी का वह छोटा बैल इसलिए सिर्फ खिलौना नहीं है।
उसके साथ खेत, पशुधन और किसान की पीढ़ियों पुरानी कहानी भी जुड़ी है।
पोरा की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
इस दिन कोई एक चीज केंद्र में नहीं रहती।
खेत में धान है, घर में पकवान हैं, आंगन में मिट्टी के खिलौने हैं, खूंटे पर सजे बैल हैं और शाम को गांव का साझा उत्सव।
यही वजह है कि इसकी पहचान केवल पशु पूजा तक सीमित नहीं है।
यह खेती-किसानी की संस्कृति, पशुधन के महत्व, कुम्हार की कला, बच्चों की दुनिया और गांव के सामूहिक जीवन को एक साथ जोड़ता है।
आज खेती के तरीके बदल गए हैं और बैलों की भूमिका भी पहले जैसी नहीं रही, लेकिन इस दिन मिट्टी का नांदिया-बैला फिर से आंगन में लौटता है।
उसके साथ लौटती है वह स्मृति, जिसमें खेत सिर्फ उत्पादन की जगह नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा हुआ करते थे।