छत्तीसगढ़ के इस दरोगा का वो फैसला, जिसने रचा अमर इतिहास !
कभी-कभी इतिहास किताब के पन्नों से निकलकर वर्तमान के बीच आ खड़ा होता है। कभी किसी पुराने क्रांतिकारी का जीवन केवल स्मृति नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भीतर एक विचार बनकर धड़कने लगता है।
और कभी किसी महान व्यक्तित्व का सबसे बड़ा स्मारक पत्थर या प्रतिमा नहीं, बल्कि उन मासूम आंखों में दिखाई देता है, जो उसके आदर्शों को अपने जीवन का संकल्प बनाने का निर्णय लेती हैं।
ग्राम बंगोली, ग्राम नीलजा और ग्राम सरगांव के बच्चों का एक साथ जुटना कुछ ऐसा ही अवसर था।
पंडित लखनलाल मिश्र पूर्व एवं माध्यमिक शाला के लगभग 300 बच्चों ने जब एक स्वर में “स्वयं से ऊपर राष्ट्र” का संकल्प लिया, तो वह केवल एक औपचारिक शपथ नहीं थी। वह उस विचार की पुनर्प्रतिष्ठा थी, जिसके लिए कभी एक व्यक्ति ने अपना पद, प्रतिष्ठा और सुरक्षित जीवन तक छोड़ दिया था।
बच्चों के बीच संस्कृति कार्यक्रम हुआ। गीत, अभिव्यक्तियां और प्रस्तुतियां हुईं। लेकिन इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण था उस महान पुरखा को याद करना, जिसने यह दिखाया था कि राष्ट्रप्रेम केवल शब्दों में नहीं, बल्कि निर्णायक क्षणों में लिए गए कठिन फैसलों में दिखाई देता है।
वह पुरखा थे- पंडित लखनलाल मिश्र।
एक वर्दी के भीतर जलता हुआ राष्ट्र
24 सितंबर 1909 को जन्मे पंडित लखनलाल मिश्र ऐसे परिवार से आए थे, जिसकी सामाजिक सेवा और देशभक्ति की परंपरा गहरी थी।
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ब्रिटिश शासन के दौर में वर्ष 1932 से वे पुलिस दरोगा के पद पर कार्यरत रहे। पद प्रतिष्ठित था, अधिकार था और जीवन में स्थायित्व भी था। लेकिन उस वर्दी के भीतर एक बेचैन भारतीय भी था।
वह भारतीय, जो अपने देशवासियों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते देखता था।
वह भारतीय, जिसके सामने एक ओर ब्रिटिश शासन की नौकरी थी और दूसरी ओर भारत की स्वतंत्रता की पुकार।
उनके भीतर यही द्वंद्व लगातार गहराता गया। वे ब्रिटिश प्रशासन का हिस्सा थे, लेकिन उनका मन स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्शों और गांधीजी के सिद्धांतों के साथ था। वे स्थानीय क्रांतिकारियों की सहायता भी करते थे। मगर सरकारी पद की सीमाएं उन्हें खुलकर मैदान में उतरने से रोकती थीं।
यह कैसी स्थिति रही होगी जब शरीर पर अंग्रेजी हुकूमत की वर्दी हो और हृदय में भारत माता की पुकार?
उनकी मनःस्थिति को रामधारी सिंह दिनकर की वे पंक्तियां जैसे आवाज देती थीं –
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
धीरे-धीरे यह आंतरिक संघर्ष उनके भीतर एक ऐसे निर्णय को जन्म दे रहा था, जो आने वाले समय में इतिहास बनना था।
15 दिसंबर 1945- जब वर्दी ने सलाम किया राष्ट्र को
दुर्ग रेलवे स्टेशन का वह दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में पंडित लखनलाल मिश्र के जीवन का निर्णायक अध्याय बन गया।
15 दिसंबर 1945।
पूर्व आई.सी.एस. अधिकारी श्री आर.के. पाटिल राष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल होने नागपुर जा रहे थे। दुर्ग रेलवे स्टेशन पर उनका कुछ समय रुकना और स्थानीय राष्ट्रवादी नेताओं से मुलाकात का कार्यक्रम था। ब्रिटिश प्रशासन को आशंका थी कि यह अवसर राष्ट्रवादी वातावरण को और प्रबल कर सकता है। इसलिए स्टेशन पर पुलिस की व्यवस्था कड़ी की गई थी।
और उस व्यवस्था की जिम्मेदारी थी वरिष्ठ दरोगा पंडित लखनलाल मिश्र के कंधों पर।
कल्पना कीजिए उस दृश्य की।
रेलवे स्टेशन पर तनावपूर्ण सन्नाटा।
ब्रिटिश शासन की निगाहें।
पुलिस की वर्दी।
और उसी वर्दी के भीतर वर्षों से धधकता हुआ राष्ट्रप्रेम।
ट्रेन आई।
आर.के. पाटिल स्टेशन पर उतरे।
और फिर अचानक वह हुआ, जिसकी कल्पना शायद वहां मौजूद किसी व्यक्ति ने नहीं की थी।
पंडित लखनलाल मिश्र अपनी पुलिस टुकड़ी से अलग हुए। उन्होंने पास खड़े एक व्यक्ति से सूत की माला ली। फिर अपनी रौबदार पुलिस वर्दी में आर.के. पाटिल को सैल्यूट किया।
और अगले ही क्षण उनके कंठ से गूंज उठा –
“भारत माता की जय!”
“महात्मा गांधी की जय!”
वह केवल जयघोष नहीं था।
वह वर्षों से भीतर बंद एक राष्ट्रभक्त आत्मा का उद्घोष था।
वह उस द्वंद्व का अंत था, जिसमें एक ओर सरकारी नौकरी थी और दूसरी ओर मातृभूमि के प्रति कर्तव्य।
वह क्षण था, जब एक ब्रिटिश पुलिस दरोगा ने अपनी वर्दी के सामने नहीं, बल्कि अपने अंतरात्मा के सामने सिर झुका दिया।
स्टेशन पर मौजूद लोग स्तब्ध रह गए। लेकिन उस उद्घोष ने वातावरण को बदल दिया। पंडित मिश्र ने अपने भीतर वर्षों से जल रही राष्ट्रभक्ति को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर दिया था।
एक क्षण में बदल गया जीवन
इतिहास में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं, जिनके बारे में सोचने के लिए व्यक्ति के पास वर्षों होते हैं, लेकिन उन्हें लेने के लिए केवल एक क्षण।
पंडित लखनलाल मिश्र के जीवन में भी वह क्षण आ चुका था।
उन्होंने अपनी पुलिस की नौकरी छोड़ दी।
एक भरा-पूरा परिवार पीछे था। जीवन की सुरक्षा थी। प्रतिष्ठित पद था। लेकिन उन्होंने इन सबके ऊपर राष्ट्र को रखा।
वे अपने गृह ग्राम मुरा लौटे और राष्ट्रीय चेतना जागरण के कार्यों में अपना जीवन लगा दिया।
यही वह बिंदु है, जहां पंडित मिश्र का जीवन केवल स्वतंत्रता सेनानी की कहानी नहीं रह जाता। वह आत्मबलिदान, नैतिक साहस और राष्ट्रनिष्ठा की पाठशाला बन जाता है।
उन्होंने युवाओं, विद्यार्थियों और समाज के विभिन्न वर्गों को संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। वे गांधीजी की अहिंसा में विश्वास रखते थे, लेकिन उनके लिए अहिंसा कमजोरी नहीं थी।
उन्होंने जिस मार्ग को अपनाया, उसे ‘परमवीर अहिंसा’ कहा जा सकता है जहां अहिंसा के साथ त्याग और साहस का अद्भुत मेल था।
क्रांति केवल तलवार से नहीं होती
पंडित लखनलाल मिश्र की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह थी कि उन्होंने राष्ट्रजागरण को केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं रखा।
साहित्य और कविता भी उनके लिए चेतना जगाने के साधन थे। तुलसीदास, कबीर और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं से वे प्रभावित थे।
उनका विश्वास था कि जब समाज के भीतर विचार जागता है, तभी वास्तविक परिवर्तन की जमीन तैयार होती है।
यही कारण है कि आज जब उनके नाम पर संचालित विद्यालयों के बच्चे एक साथ खड़े होकर “स्वयं से ऊपर राष्ट्र” का संकल्प लेते हैं, तो यह केवल एक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं लगता।
यह उस विचार की निरंतरता दिखाई देती है।
तब पंडित मिश्र युवाओं को संगठित कर रहे थे।
आज उन्हीं की स्मृति में बच्चे एकत्रित होकर अपने राष्ट्र के प्रति दायित्व को समझने का प्रयास कर रहे हैं।
तब एक दरोगा ने अपनी वर्दी के भीतर छिपे राष्ट्रभक्त को मुक्त किया था।
आज उन्हीं की स्मृति में सैकड़ों बच्चे अपने भीतर छिपे जिम्मेदार नागरिक को जगाने का संकल्प ले रहे हैं।
समय बदल गया है।
पर सवाल वही है –
व्यक्ति अपने से ऊपर किसे रखता है?
“स्वयं से ऊपर राष्ट्र” एक शपथ से कहीं अधिक
बच्चों के लिए राष्ट्र का अर्थ केवल नक्शे पर बनी सीमाएं नहीं हैं।
राष्ट्र का अर्थ है अपना समाज, अपनी संस्कृति, अपने पुरखे, अपनी जिम्मेदारियां और वह भविष्य, जिसे अगली पीढ़ी के हाथों में सौंपना है।
जब लगभग 300 बच्चे एक साथ खड़े होकर “स्वयं से ऊपर राष्ट्र” कहते हैं, तो उस सामूहिक स्वर में भविष्य की एक तस्वीर दिखाई देती है।
वह तस्वीर, जिसमें राष्ट्रप्रेम केवल समारोहों तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण का हिस्सा बने।
जहां विद्यार्थी अपने विद्यालय को जिम्मेदारी से देखें।
जहां युवा समाज के प्रति संवेदनशील हों।
जहां संस्कृति केवल मंच पर प्रस्तुति न होकर जीवन में दिखाई दे।
जहां देश के लिए कुछ करने का अर्थ केवल बड़े त्याग नहीं, बल्कि अपने छोटे-छोटे कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना भी हो।
और शायद यही पंडित मिश्र की स्मृति का सबसे सार्थक अर्थ है।
तीन गांव, एक विरासत, एक संकल्प
ग्राम बंगोली, ग्राम नीलजा और ग्राम सरगांव के बच्चों का एक जगह एकत्र होना अपने आप में इस बात का प्रतीक है कि विरासत किसी एक परिवार या एक गांव की संपत्ति नहीं होती।
महान व्यक्तित्व पूरे समाज के होते हैं।

पंडित लखनलाल मिश्र की स्मृति में संचालित इन विद्यालयों और वहां पढ़ने वाले बच्चों ने संस्कृति कार्यक्रम के माध्यम से अपने महान त्यागी पुरखा को याद किया। गीतों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के बीच उनके जीवन की कहानी बच्चों के सामने जीवंत हुई।
एक ऐसी कहानी, जिसमें पद था लेकिन पद से बड़ा राष्ट्र था।
सुविधा थी लेकिन सुविधा से बड़ा कर्तव्य था।
भविष्य की चिंता थी लेकिन मातृभूमि के प्रति जिम्मेदारी उससे बड़ी थी।
और अंततः एक ऐसा निर्णय था, जिसने उनके जीवन को इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दिया।
आज भी जिंदा है वह आवाज
पंडित लखनलाल मिश्र 16 मार्च 1984 को अपनी जन्मभूमि मुरा में अंतिम सांस लेकर भले ही भौतिक रूप से इस संसार से विदा हो गए, लेकिन उनका जीवन एक विचार छोड़ गया।

वह विचार है – पद से बड़ा कर्तव्य।
वह विचार है – सुविधा से बड़ा राष्ट्र।
वह विचार है – स्वयं से ऊपर समाज और देश।
स्वतंत्रता के बाद जब मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राज्य विजिलेंस प्रमुख का दायित्व सौंपना चाहा, तब भी उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। उनका तर्क था कि मातृभूमि के लिए किए गए कर्तव्यों का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता और उसके बदले कोई प्रतिसाद नहीं लिया जाना चाहिए।
यही प्रसंग उनके व्यक्तित्व की ऊंचाई को समझने के लिए पर्याप्त है।
जिस व्यक्ति ने स्वतंत्रता के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी, उसने स्वतंत्रता के बाद अपने त्याग की कीमत भी नहीं मांगी।
यही त्याग उन्हें केवल इतिहास का पात्र नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का प्रेरणास्रोत बनाता है।
और फिर बच्चों ने उठाया हाथ…
संस्कृति कार्यक्रम समाप्ति की ओर था।
सैकड़ों बच्चे सामने थे।
उनके चेहरों पर बचपन की सहजता थी, लेकिन उस क्षण उनकी आंखों में इतिहास की चमक भी थी।
उन्होंने अपने महान पुरखा को याद किया।
उस दरोगा को याद किया, जिसने एक दिन ब्रिटिश शासन की वर्दी पहनकर भी भारत माता की जय का उद्घोष किया था।
उस व्यक्ति को याद किया, जिसने अपने सुरक्षित जीवन से ऊपर स्वतंत्रता को चुना था।
और फिर वे एक साथ खड़े हुए।
हाथ उठे।
स्वर एक हुआ।
“स्वयं से ऊपर राष्ट्र।”
यह आवाज केवल विद्यालय के परिसर में नहीं गूंजी।
यह उन गलियों तक पहुंची होगी, जहां कभी स्वतंत्रता की चेतना को स्वर देने वाले लोग चले होंगे।
यह उन खेतों तक पहुंची होगी, जिनके बीच पंडित मिश्र की जन्मभूमि ने उन्हें संस्कार दिए।
और शायद यह इतिहास के उस अध्याय तक भी पहुंची होगी, जहां 15 दिसंबर 1945 को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर एक आवाज गूंजी थी—
“भारत माता की जय!”
उस दिन एक दरोगा ने नौकरी छोड़ी थी।
आज उन्हीं की स्मृति में सैकड़ों बच्चों ने एक विचार अपनाया है।
यही इतिहास की सबसे सुंदर निरंतरता है।
एक पीढ़ी स्वतंत्रता के लिए त्याग करती है।
दूसरी पीढ़ी उस त्याग को स्मृति में रखती है।
और तीसरी पीढ़ी उससे अपना भविष्य गढ़ने का संकल्प लेती है।
पंडित लखनलाल मिश्र की गाथा इसलिए अमर है क्योंकि वह केवल अतीत की कहानी नहीं है। वह आज भी पूछती है—
जब व्यक्तिगत स्वार्थ और राष्ट्रहित आमने-सामने हों, तब हम किसे चुनेंगे?
इन बच्चों ने उस प्रश्न का अपना उत्तर दे दिया है।
“स्वयं से ऊपर राष्ट्र।”
और शायद यही किसी महान पुरखे को सच्ची श्रद्धांजलि है उसके नाम पर केवल दीप जलाना नहीं, बल्कि उसके जीवन से एक दीप अपने भीतर जलाना।
पंडित लखनलाल मिश्र की स्मृति में आज उठे ये नन्हे हाथ आने वाले भारत की तस्वीर हैं।
उनकी आंखों में सपने हैं।
उनकी आवाज में संकल्प है।
और उनके पीछे खड़ी है एक ऐसी विरासत, जिसने कभी एक वर्दीधारी दरोगा को क्रांति के पथ पर चलने का साहस दिया था।
वह कहानी समाप्त नहीं हुई है।
वह आज भी चल रही है –
इन बच्चों के संकल्प में,
इनकी संस्कृति में,
इनकी चेतना में,
और उस एक वाक्य में –
“स्वयं से ऊपर राष्ट्र।”