राजिम : पंडित सुंदरलाल शर्मा का नाम छत्तीसगढ़ के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
वे न केवल एक निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि कुशल आयोजक, समाज सुधारक, कवि और पत्रकार भी थे।
महात्मा गांधी के विचारों को छत्तीसगढ़ की माटी में रोपने और दलित वर्ग के अधिकारों के लिए अग्रदूत बनने के कारण उन्हें ‘छत्तीसगढ़ का गांधी’ कहा जाता है।
1. प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
पंडित सुंदरलाल शर्मा का जन्म 21 दिसंबर 1881 को राजिम के निकट चमसूर गाँव में हुआ था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, लेकिन अपनी कुशाग्र बुद्धि से उन्होंने हिंदी, मराठी, संस्कृत, अंग्रेजी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं पर महारत हासिल की।
बाल्यावस्था से ही उनकी रुचि साहित्य, कला और समाज सेवा की ओर थी।
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2. स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका
पंडित सुंदरलाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया।
उन्होंने क्षेत्र के युवाओं को एकत्रित कर स्वदेशी और स्वराज का संदेश दिया।
कंडेल नहर सत्याग्रह (1920) –
धमतरी जिले के कंडेल गाँव में ब्रिटिश सरकार द्वारा किसानों पर जबरन ‘नहर कर’ (Canal Tax) थोपा गया था।
इसके विरोध में पंडित सुंदरलाल शर्मा ने ऐतिहासिक कंडेल नहर सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए वे स्वयं कोलकाता जाकर महात्मा गांधी को पहली बार छत्तीसगढ़ (20 दिसंबर 1920) लेकर आए।
गांधीजी के आगमन की खबर मिलते ही ब्रिटिश सरकार ने नहर कर वापस ले लिया।
यह छत्तीसगढ़ के किसान और जन-आंदोलन की पहली बड़ी राजनीतिक विजय थी।
जेल पत्रिका (1921-22) –
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल यात्रा करते हुए उन्होंने रायपुर जेल से हस्तलिखित ‘जेल पत्रिका’ का संपादन किया,
जो बंदियों और बाहर के कार्यकर्ताओं में देशभक्ति का अलख जगाती थी।
3. अछूतोद्धार और समाज सुधार के अग्रदूत –
पंडित सुंदरलाल शर्मा का मानना था कि जब तक समाज से छुआछूत मिटेगी नहीं, तब तक वास्तविक आजादी संभव नहीं है।
राजीव लोचन मंदिर प्रवेश (1925): महात्मा गांधी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर अछूतोद्धार कार्यक्रम शुरू करने से पहले ही,
पंडित सुंदरलाल शर्मा ने 1925 में राजिम के प्रसिद्ध श्री राजीव लोचन मंदिर में दलित वर्ग के लोगों को प्रवेश कराया।
महात्मा गांधी द्वारा गुरु की उपाधि
1933 में जब महात्मा गांधी अपनी दूसरी छत्तीसगढ़ यात्रा पर आए, तो उन्होंने पंडित सुंदरलाल शर्मा के सामाजिक कार्यों की सराहना करते हुए कहा था कि “अछूतोद्धार के कार्य में पंडित सुंदरलाल शर्मा मेरे अग्रज और गुरु हैं।”
4. पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वप्नद्रष्टा
वर्ष 1918 में पंडित सुंदरलाल शर्मा ने अपनी पांडुलिपि (डायरी) में भौगोलिक और सांस्कृतिक आधार पर पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का पहला नक्शा तैयार किया था।
वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने छत्तीसगढ़ी अस्मिता और इस अंचल के विकास के लिए एक अलग प्रशासनिक राज्य की आवश्यकता को पहचाना।
5. छत्तीसगढ़ी साहित्य और पत्रकारिता में योगदान
पंडित सुंदरलाल शर्मा केवल एक नेता नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार भी थे:
दानलीला (1888/1905):
यह छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रथम प्रबंध काव्य माना जाता है,
जिसमें श्री कृष्ण की लीलाओं का सरस वर्णन छत्तीसगढ़ी बोली में किया गया है।
संस्थाओं की स्थापना:
उन्होंने राजिम में ‘कवि समाज’ की स्थापना की और स्वदेशी वस्त्रों को बढ़ावा देने के लिए खादी कताई-बुनाई केंद्र और ‘समरक्षक सभा’ गठित की।
उनकी अन्य कृतियों में ध्रुव चरित्र, करुणा पचीसी, प्रह्लाद चरित्र और सच्चा सरदार जैसी रचनाएं शामिल हैं।
निष्कर्ष
28 दिसंबर 1940 को पंडित सुंदरलाल शर्मा इस दुनिया से विदा हो गए,
लेकिन छत्तीसगढ़ के निर्माण, साहित्य और सामाजिक समरसता में उनका योगदान अमर है।
उनके सम्मान में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा साहित्य और आंचलिक कला के क्षेत्र में ‘पंडित सुंदरलाल शर्मा सम्मान’ दिया जाता है
तथा पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय (PSSOU, बिलासपुर) उनके नाम पर स्थापित है।