रायपुर | हाल के दिनों में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ बढ़ते अपराधों, उत्पीड़न और असुरक्षा के माहौल ने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रविवार को राजधानी की सड़कों पर महिलाओं, युवतियों और युवाओं ने एक बड़ा शांतिपूर्ण मार्च निकाला।
महिला थाना चौक से शुरू हुआ यह मार्च प्रशासनिक जवाबदेही और सुरक्षा की गारंटी की मांग को लेकर आगे बढ़ा, जिसे मोतीबाग चौक के पास पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद यह विरोध प्रदर्शन चर्चा का विषय बन गया।
घटनाक्रम: मार्च, पुलिस की रोक और तीखे नारे
यह मार्च महिला थाना चौक से शुरू होकर मोतीबाग चौक तक पहुंचा, जहां पुलिस ने भारी सुरक्षा के बीच प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद मौके पर जमकर नारेबाजी हुई।
इस प्रदर्शन के दौरान छात्रों और युवाओं द्वारा लगाए गए कुछ नारे विशेष रूप से आकर्षण और चर्चा का केंद्र रहे:
“नारी सुरक्षा हमारा अधिकार है, कोई एहसान नहीं”
“एक कचौरी, दो समोसे, इन मर्दों का क्या भरोसा!”
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इन नारों के जरिए प्रदर्शनकारियों ने न केवल प्रशासनिक उदासीनता पर तंज कसा, बल्कि समाज में व्याप्त सोच और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी उठाए।
रायपुर : कोर मुद्दे और 15-सूत्रीय मांग-पत्र
प्रदर्शनकारियों का साफ कहना था कि महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा केवल कागजी घोषणाओं और विज्ञापनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे जमीनी स्तर पर लागू किया जाना बेहद जरूरी है।

शासन के समक्ष सौंपे गए 15-सूत्रीय मांग-पत्र में प्रमुख रूप से निम्नलिखित मुद्दे उठाए गए:
सार्वजनिक सुरक्षा: स्कूल-कॉलेजों, सड़कों, सार्वजनिक परिवहन और कार्यस्थलों पर पूरी तरह सुरक्षित माहौल का निर्माण।
स्वास्थ्य और स्वच्छता: मुफ्त सैनिटरी पैड की उपलब्धता।
कानून व्यवस्था: महिला पुलिस गश्त (Patrolling) को बढ़ाना और साइबर अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई।
न्याय प्रणाली: पीड़िताओं को त्वरित और निष्पक्ष न्याय दिलाना।
प्रमुख बयान: क्या कह रहे हैं आंदोलनकारी?
इस विरोध प्रदर्शन में शामिल प्रमुख कार्यकर्ताओं और वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि यह लड़ाई सिर्फ महिलाओं की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है:
प्रियंका उपाध्याय:
“महिलाओं की सुरक्षा कोई एहसान नहीं, हमारा अधिकार है। हर लड़की को बिना डर के घर से बाहर निकलने और सुरक्षित माहौल में जीने का अधिकार मिलना चाहिए।”
लिली श्रीवास:
“महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। जब तक महिलाएं सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी, तब तक समानता की बात अधूरी रहेगी।”
पुनेश्वर लहरे:
“महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में युवाओं को भी आगे आना होगा। महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर सख्त कार्रवाई हो और उनकी जायज़ मांगों को गंभीरता से सुना जाए।”
यह प्रदर्शन क्यों मायने रखता है?
यह मार्च केवल एक सांकेतिक विरोध नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि नागरिक समाज (Civil Society) और युवा अब प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने लगे हैं।
कार्यस्थलों से लेकर सड़कों तक महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत बदलाव और जमीनी स्तर पर सख्त अमलीकरण की आवश्यकता है।
इस आंदोलन में प्रियंका उपाध्याय, लिली श्रीवास, पुनेश्वर लहरे के साथ-साथ मंजिमा सांडिल, मिताली, रागनी, रूबेन, इंडिया उपासना, निधि, सौरभ, उन्नति, खुशबू, नयन्सी, लिज़ा और स्वाति सहित बड़ी संख्या में युवा शामिल रहे।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन-प्रशासन इस 15-सूत्रीय मांग-पत्र पर क्या और कब ठोस कदम उठाता है।