गांधी : 21वीं सदी के सूचना-क्रांति काल में सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को राजनीतिक चश्मे और सोशल मीडिया के दुष्प्रचार से बचाना है।
आधुनिक भारत के जनमानस में महात्मा गांधी को लेकर दो स्पष्ट और आक्रामक धाराएं दिखाई देती हैं।
एक धारा उन्हें आलोचना से परे ‘संत’ या ‘देवता’ बनाकर पूजती है और उनकी हर रणनीतिक विफलता पर पर्दा डालने का प्रयास करती है।
दूसरी धारा उन्हें भारतीय इतिहास की हर त्रासदी, विभाजन और कमजोरी का एकमात्र जिम्मेदार ठहराकर ‘खलनायक’ चित्रित करती है।
नायक को ‘देवता’ न बनने दिया जाए और न ही किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को बलि का बकरा बनाया जाए।
मोहनदास करमचंद गांधी न तो कोई पूर्ण अलौकिक संत थे और न ही कोई षड्यंत्रकारी नेता।
वे मांस-मज्जा के बने एक अत्यंत जटिल, जिद्दी, व्यावहारिक और विरोधाभासों से भरे ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने अपनी रणनीतिक भूलों से देश को भारी नुकसान भी पहुँचाया, तो दूसरी ओर अपने नैतिक और सत्याग्रही नेतृत्व से दुनिया के सबसे शक्तिशाली औपनिवेशिक साम्राज्य को बिना हथियार उठाए घुटनों पर ला दिया।
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गांधी का यथार्थवादी मूल्यांकन करने के लिए उनकी ऐतिहासिक गलतियों, व्यक्तिगत अपवादों, उनके खिलाफ फैलाए गए प्रायोजित झूठों और समाज पर पड़े उनके वास्तविक प्रभावों का प्राथमिक ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है।
1. ऐतिहासिक गलतियाँ: जहाँ गांधी की रणनीति विफल रही
यदि किसी नेता का मूल्यांकन उसके अंतिम परिणामों से किया जाए, तो गांधी के राजनीतिक जीवन में तीन ऐसे मुख्य चौराहे आए जहाँ उनके व्यक्तिगत हठ और गलत रणनीतिक फैसलों ने देश के भविष्य पर नकारात्मक छाप छोड़ी।
खिलाफत आंदोलन और राजनीति में संप्रदाय का प्रवेश (1919-1922)
गांधी की सबसे बड़ी और घातक रणनीतिक भूल 1919 में असहयोग आंदोलन के साथ ओटोमन साम्राज्य (तुर्की) के ‘खिलाफत आंदोलन’ को जोड़ना थी।
निर्णय का स्वरूप: गांधी का उद्देश्य असहयोग आंदोलन में मुस्लिम समुदाय को जोड़कर ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ का एक विशाल मंच तैयार करना था।
लेकिन इसके लिए उन्होंने एक शुद्ध धार्मिक और विदेशी मुद्दे तुर्की के खलीफा के पद की पुनर्स्थापना को भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बना दिया।
दुष्परिणाम: यह एकता केवल सतही साबित हुई। 1924 में जैसे ही तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने खलीफा का पद समाप्त किया, भारत में खिलाफत आंदोलन अप्रासंगिक हो गया।
लेकिन इसके द्वारा जगाई गई धार्मिक कट्टरता ने भारत में सांप्रदायिकता का भयंकर रूप ले लिया। इसका पहला खूनी परिणाम 1921 का ‘मोपला दंगा’ (केरल) था, जहाँ हजारों हिंदुओं का नरसंहार हुआ।
ऐतिहासिक साक्ष्य: महान इतिहासकार आर.सी. मजूमदार अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया’ (खंड 3) में लिखते हैं कि
“धार्मिक जुनून को राष्ट्रीय आंदोलन में जगह देकर गांधी ने अनजाने में उस सांप्रदायिक विषवृक्ष को सींचा, जिसकी परिणति 1947 के विभाजन में हुई।”
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भी अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान ओर द पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में लिखा कि
खिलाफत आंदोलन ने भारतीय मुसलमानों के भीतर राष्ट्रीय चेतना के बजाय धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दिया।
त्रिपुरी कांग्रेस संकट (1939):
लोकतंत्र पर नैतिक वर्चस्व : गांधी के राजनीतिक जीवन पर सबसे बड़ा नैतिक धब्बा 1939 का त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन माना जाता है, जहाँ उन्होंने पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपने व्यक्तिगत दबदबे से कुचल दिया।
घटनाक्रम: कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में सुभाषचंद्र बोस ने गांधी समर्थित उम्मीदवार भोगराजू पट्टाभि सीतारमैया को 203 वोटों से हरा दिया।
गांधी की प्रतिक्रिया: इस हार को लोकतांत्रिक ढंग से स्वीकार करने के बजाय गांधी ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि “पट्टाभि की हार मेरी व्यक्तिगत हार है।” इसके बाद गांधी के वफादार सहयोगियों (कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 15 में से 12 सदस्यों) ने इस्तीफा दे दिया और बोस के लिए काम करना असंभव बना दिया।
परिणाम: बहुमत से चुने जाने के बावजूद सुभाषचंद्र बोस को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा।
यहाँ गांधी का रवैया लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत एक हठी नेता का था, जो अपने से भिन्न विचार (सशस्त्र या आक्रामक रणनीति) को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
द्वितीय विश्व युद्ध और नाजियों को अहिंसा की अव्यावहारिक सलाह
1940-41 के दौरान, जब नाजी जर्मनी यूरोप पर कहर बरपा रहा था और लाखों यहूदियों का नरसंहार कर रहा था, तब गांधी ने जो बयान दिए, वे व्यावहारिक धरातल से पूरी तरह कटे हुए थे।
गांधी का आह्वान: गांधी ने ब्रिटिश जनता को सलाह दी कि वे हिटलर और मुसोलिनी के सामने अपने हथियार डाल दें और उन्हें अपनी भूमि पर कब्जा करने दें।
उन्होंने यहूदियों को भी सलाह दी कि वे नाजियों के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध करें और सहर्ष सामूहिक बलिदान दें, जिससे हिटलर का हृदय परिवर्तन हो जाएगा।
स्रोत: ‘द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ (CWMG, खंड 72, पृष्ठ 229) में दर्ज उनका लेख ‘ऑल मैन आर ब्रदर्स’ इस बात का प्रामाणिक साक्ष्य है।
युद्ध और भू-राजनीति के मैदान में गांधी की अहिंसा का यह रूप एक अव्यावहारिक और खतरनाक कल्पना बन चुका था।
2. विवाद और व्यक्तिगत अपवाद: आलोचकों के तीखे सवाल
गांधी के जीवन के कुछ व्यक्तिगत प्रयोग और विचार इतने विवादास्पद रहे हैं कि उनके निकटतम साथी और आधुनिक समाजशास्त्रियों के लिए भी उनका बचाव करना नामुमकिन हो जाता है।
नोआखली के दौर में ‘ब्रह्मचर्य के प्रयोग’ (1946-47)
गांधी के जीवन का सबसे चर्चित और विवादित अध्याय उनके जीवन के अंतिम चरण में किए गए ‘ब्रह्मचर्य के प्रयोग’ (Celibacy Experiments) हैं।
प्रयोग का स्वरूप: 1946 में जब बंगाल के नोआखली में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क रहे थे, तब 77 वर्षीय गांधी अपनी 19 वर्षीया नातिन मनु गांधी और आभा गांधी के साथ एक ही बिस्तर पर नग्न होकर सो रहे थे।
गांधी का तर्क: गांधी का मानना था कि देश में फैल रही सांप्रदायिक हिंसा का कारण उनके अपने भीतर की कोई नैतिक कमी या छिपी हुई वासना हो सकती है। वे अपनी वासना पर पूर्ण विजय की परीक्षा ले रहे थे।
सहयोगियों का विरोध: किसी भी आधुनिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक मानक पर यह व्यवहार बेहद अनुचित था।
उनके करीबी सहयोगी आचार्य जे.बी. कृपलानी, देवदास गांधी (उनके पुत्र) और प्यारेलाल ने इसका तीव्र विरोध किया। कृपलानी ने गांधी को लिखे पत्र में स्पष्ट रूप से कहा था कि
“आपके इन प्रयोगों से समाज और स्वतंत्रता आंदोलन दोनों की साख मिट्टी में मिल रही है।”
इसके बावजूद गांधी अपनी जिद पर अड़े रहे।
दक्षिण अफ्रीका के शुरुआती वर्षों में नस्लीय दृष्टिकोण (1893-1905)
गांधी के दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के शुरुआती वर्षों के लेख उनके व्यक्तित्व के एक ऐसे पक्ष को सामने लाते हैं, जो औपनिवेशिक नस्लवाद से प्रभावित था।
दस्तावेजी साक्ष्य: गांधी ने अपने समाचार पत्र ‘द इंडियन ओपिनियन’ में लिखे शुरुआती लेखों में दक्षिण अफ्रीका के मूल अश्वेत निवासियों के लिए अपमानजनक शब्द ‘काफिर’ (Kaffir) का प्रयोग किया।
उन्होंने तर्क दिया कि अंग्रेजों को भारतीय व्यापारियों और मजदूरों को अश्वेतों के समकक्ष नहीं आंकना चाहिए क्योंकि भारतीय नस्लीय रूप से उनसे श्रेष्ठ हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक ‘गांधी बिफोर इंडिया’ में स्वीकार करते हैं कि 24 साल की उम्र में जब गांधी दक्षिण अफ्रीका पहुँचे, तो वे एक विक्टोरियन औपनिवेशिक बैरिस्टर की तरह सोचते थे जो केवल अपनी बिरादरी के अधिकारों की बात कर रहा था।
हालांकि 1906 के बामबाथा ज़ुलु विद्रोह के बाद गांधी के विचारों में गहरा रूपांतरण आया और उन्होंने नस्लीय भेदभाव का पूर्ण त्याग किया, लेकिन उनके शुरुआती लेख इतिहास के पन्नों में एक अपवाद बनकर दर्ज हैं।
जाति व्यवस्था पर रुख और डॉ. अंबेडकर से संघर्ष
जाति और अस्पृश्यता के प्रश्न पर गांधी का दृष्टिकोण डॉ. बी.आर. अंबेडकर के क्रांतिकारी विचारों के सामने हमेशा कटघरे में खड़ा रहा।
वैचारिक अंतर: जहाँ डॉ. अंबेडकर कानूनी और राजनीतिक अधिकारों, पृथक निर्वाचक मंडल और जाति व्यवस्था के पूर्ण विनाश (Annihilation of Caste) के पक्षधर थे, वहीं गांधी एकीकृत हिंदू समाज के भीतर सामाजिक आत्म-शुद्धि, वर्ण-व्यवस्था में सुधार और अस्पृश्यता के अंत पर बल दे रहे थे।
वर्ण-व्यवस्था का बचाव: गांधी लंबे समय तक वर्ण-व्यवस्था के समर्थक रहे। उनका मानना था कि जाति व्यवस्था में दोष अस्पृश्यता का है, न कि श्रम के विभाजन का। वे हिंदू समाज के भीतर आत्म-शुद्धि के जरिए सुधार चाहते थे।
1932 का पूना पैक्ट: ब्रिटिश सरकार ने जब 1932 में ‘कम्युनल अवॉर्ड’ के तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) की घोषणा की, तो गांधी ने इसे हिंदू समाज को विखंडित करने की साजिश माना। उन्होंने येरवाड़ा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया।
अंबेडकर की विवशता: गांधी के गिरते स्वास्थ्य और देश भर में दलितों पर संभावित हमलों के दबाव के कारण डॉ. अंबेडकर को अपनी मांग पीछे खींचनी पड़ी और ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर करने पड़े।
अंबेडकर ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ में तीखा प्रहार करते हुए लिखा कि
“गांधी के अनशन ने दलितों को उनके स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व और वास्तविक अधिकारों से वंचित कर दिया।”
3. प्रायोजित झूठ बनाम कड़वा ऐतिहासिक सच
जिस प्रकार गांधी की गलतियों की समीक्षा करना जरूरी है, उसी प्रकार आधुनिक राजनीतिक प्रचार तंत्र (Propaganda Machinery) द्वारा गांधी के खिलाफ गढ़े गए मनगढ़ंत झूठों का पर्दाफाश करना भी एक धर्म है।
झूठ 1: “गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुक जाती”
इंटरनेट और जनसभाओं में यह झूठ सबसे ज्यादा फैलाया जाता है कि गांधी ने गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की रिहाई की शर्त नहीं रखी, या फिर उन्होंने फांसी पर सहमति दी थी।
कानूनी और ऐतिहासिक तथ्य: 5 मार्च 1931 को हुआ गांधी-इरविन समझौता राजनीतिक बंदियों की रिहाई के लिए था।
ब्रिटिश कानून के अनुसार जॉन सांडर्स की हत्या में भगत सिंह और उनके साथियों को हिंसा का दोषी पाया गया था। ब्रिटिश सरकार किसी भी कीमत पर हिंसक मुकदमों के दोषियों को छोड़ने को तैयार नहीं थी, क्योंकि इससे पंजाब पुलिस में विद्रोह की स्थिति बन जाती।
प्रामाणिक स्रोत: ‘द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी’ (CWMG, खंड 45) और लॉर्ड इरविन की आत्मकथा ‘फुलनेस ऑफ डेज’ के अनुसार, गांधी ने 18 और 19 मार्च 1931 को वायसराय लॉर्ड इरविन से व्यक्तिगत मुलाकात कर भगत सिंह की फांसी टालने या सजा उम्रकैद में बदलने की पुरजोर वकालत की थी।
23 मार्च 1931 की सुबह (फांसी के दिन) गांधी ने वायसराय को एक भावुक पत्र भी लिखा था।
भगत सिंह का स्वयं का रुख: स्वयं भगत सिंह और उनके साथियों ने कभी दया याचिका दायर नहीं की। उन्होंने पंजाब के गवर्नर को लिखे अंतिम पत्र में मांग की थी कि वे युद्धबंदी हैं, इसलिए उन्हें फांसी देने के बजाय गोली से उड़ाया जाए।
इतिहासकार बी.आर. नंदा अपनी पुस्तक ‘गांधी एंड हिज क्रिटिक्स’ में स्पष्ट लिखते हैं कि गांधी ने अपनी अहिंसा की सीमा में रहते हुए फांसी रुकवाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार अपने फैसले पर अडिग थी।
झूठ 2: “गांधी भारत के विभाजन के मुख्य जिम्मेदार थे”
दक्षिणपंथी और उग्र-राष्ट्रवादी विमर्श में गांधी को भारत-पाकिस्तान बंटवारे का मुख्य अभियुक्त बनाकर पेश किया जाता है।
वास्तविक घटनाक्रम: 1946-47 तक आते-आते भारत में मुस्लिम लीग के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के कारण भीषण दंगे शुरू हो चुके थे।
लॉर्ड माउंटबेटन ने जब विभाजन की योजना (3 जून योजना) पेश की, तो उसे स्वीकार करने वाले सबसे पहले नेता सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू थे।
पटेल का स्पष्ट मानना था कि एक जर्जर और गृहयुद्ध से जूझते भारत से बेहतर है कि जिन्ना को अलग पाकिस्तान देकर एक मजबूत केंद्रीय सरकार वाला भारत बनाया जाए।
मौलाना आजाद का साक्ष्य: पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद अपनी आत्मकथा ‘इंडिया विंस Freedom’ में लिखते हैं कि
“विभाजन के सबसे बड़े समर्थकों में सरदार पटेल सबसे आगे थे। जब मैंने गांधी जी से बात की, तो वे विभाजन के सख्त खिलाफ थे।”
गांधी का अंतिम प्रयास: गांधी ने 31 मार्च 1947 को माउंटबेटन के सामने प्रस्ताव रखा कि विभाजन रोकने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को अखंड भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाए और पूरी कैबिनेट चुनने का अधिकार दिया जाए।
लेकिन नेहरू और पटेल दोनों ने इस व्यावहारिक जोखिम को लेने से मना कर दिया। 15 अगस्त 1947 को जब दिल्ली में सत्ता का जश्न मन रहा था, तब 78 साल का यह बूढ़ा नेता दिल्ली से हजारों मील दूर बंगाल के नोआखली में दंगों की आग बुझाने के लिए अकेले नंगे पैर घूम रहा था।
4. समाज पर गांधी का सकारात्मक और चिरंतन प्रभाव
तमाम राजनीतिक असफलताओं, रणनीतिक गलतियों और व्यक्तिगत विवादों के बावजूद, इतिहास गांधी के योगदान को नकार नहीं सकता।
गांधी की वास्तविक महानता इस बात में नहीं है कि वे गलती नहीं करते थे, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने भारतीय समाज की अंतरात्मा को बदलकर रख दिया।
स्वतंत्रता संग्राम का जनतंत्रीकरण (Mass Democratization)
गांधी के आगमन से पहले (1919 से पूर्व) भारत का स्वतंत्रता संग्राम वकीलों, बड़े जमींदारों और कुलीन बुद्धिजीवियों के ड्राइंग-रूम और अध्ययन कक्षों तक सीमित था। (कुछ घटनाओं को छोड़ कर, किंतु वह भी व्यापक राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भावना से पूरी तरह परिपूर्ण नहीं था)
वे ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर या याचिकाएं देकर रियायतें मांगते थे।गांधी ने इस आंदोलन को भारत के 7 लाख गांवों, किसानों, मिल मजदूरों, महिलाओं और तथाकथित अछूतों का ‘जन-आंदोलन’ बना दिया।
चंपारण (1917) और खेड़ा (1918) के किसान सत्याग्रहों, कर-बंदी अभियानों से लेकर 1930 के नमक सत्याग्रह तक, गांधी ने देश के सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति के मन से दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य का खौफ निकाल दिया और सामूहिक प्रतिरोध की नींव रखी।
महिलाओं को सार्वजनिक जीवन के केंद्र में लाना
भारतीय इतिहास में गांधी से पहले किसी भी राजनीतिक या सामाजिक नेता ने महिलाओं को इतनी बड़ी संख्या में घर की चहारदीवारी बाहर निकालकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में खड़ा नहीं किया था।
1930 के नमक सत्याग्रह, शराबबंदी और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरने में लाखों महिलाओं ने भाग लिया।
सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, सुचेता कृपलानी और कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसी नेत्रियों ने इसी आंदोलन से नेतृत्व की कमान संभाली।
सत्याग्रह: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर चोट
गांधी की अहिंसा कोई कायरतापूर्ण सिद्धांत नहीं थी, बल्कि वह एक रणनीति थी (Militant Nonviolence)। गांधी जानते थे कि ब्रिटेन भारत पर शासन अपनी सैन्य शक्ति से ज्यादा ‘भारतीयों के सहयोग’ और ‘व्यापारिक लाभ’ के लिए कर रहा है।
स्वदेशी और बहिष्कार: गांधी ने खादी और स्वदेशी के माध्यम से ब्रिटेन के मैनचेस्टर और लंकाशायर के कपड़ा उद्योगों को सीधा नुकसान पहुँचाया।
सत्याग्रह की शक्ति: जब बिना एक भी लाठी उठाए हजारों सत्याग्रही अंग्रेजों की लाठियां और गोलियां सहते थे (जैसे 1930 का धरासणा नमक सत्याग्रह), तो ब्रिटिश साम्राज्य का नैतिक आवरण दुनिया के सामने धब्बों से भर जाता था।
अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर (Webb Miller) की रिपोर्टिंग ने पूरी दुनिया में ब्रिटिश शासन की क्रूरता को बेनकाब कर दिया था।
सतत विकास और पर्यावरण की भावी दृष्टि
आज 21वीं सदी में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन (Global Warming) और अंधी उपभोक्तावादी संस्कृति के संकट से जूझ रही है, तब गांधी के विचार सबसे प्रासंगिक बनकर उभरते हैं।
1928 में गांधी ने लिखा था:
“ईश्वर न करे कि भारत कभी पश्चिम की तरह औद्योगिक रूप से विकसित हो। एक छोटे से द्वीप देश (ब्रिटेन) को दुनिया को लूटने के लिए इतने संसाधनों की जरूरत पड़ी, तो भारत जैसा विशाल देश अगर उस रास्ते पर चला, तो वह पूरी दुनिया को रेगिस्तान बना देगा।”
उनका यह वाक्य :
“पृथ्वी के पास हर मनुष्य की आवश्यकता (Need) पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन किसी के लालच (Greed) के लिए नहीं”
आज वैश्विक पर्यावरण आंदोलन का मूल मंत्र बन चुका है।
5. वैश्विक पटल पर गांधी का स्थायी प्रभाव
गांधी की प्रासंगिकता केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। 20वीं और 21वीं सदी के सबसे बड़े मानवाधिकार आंदोलनों ने गांधी की सत्याग्रह तकनीक को अपनाकर ही विजय प्राप्त की।
अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1950-60 के दशक में अफ़्रीकी-अमेरिकियों के नागरिक अधिकारों (Civil Rights Movement) की लड़ाई के लिए गांधी के अहिंसक सत्याग्रह को ही अपना मुख्य हथियार बनाया।
दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने रंगभेद (Apartheid) की दमनकारी नीति के खिलाफ संघर्ष में गांधीवादी सिद्धांतों का प्रयोग किया और कहा था:
“गांधी हमारे लिए केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक थे।”
यूरोप में पोलैंड के नेता लेक वालेसा (Lech Wałęsa) ने अपने ‘सोलिडारिटी आंदोलन’ के माध्यम से सोवियत समर्थित कम्युनिस्ट तानाशाही को बिना एक भी गोली चलाए उखाड़ फेंका।
वहीं म्यांमार में आंग सान सू की ने सैन्य जुंटा तानाशाही के खिलाफ दशकों तक गांधीवादी अहिंसक आंदोलन का ही नेतृत्व किया।
कहानी किस्सों से परे एक जननेता
महात्मा गांधी का ऐतिहासिक मूल्यांकन करते समय हमें यह स्वीकार करना होगा कि वे किसी दैवीय अवतार की तरह त्रुटिहीन नहीं थे।
खिलाफत आंदोलन में धर्म का राजनीतिकरण करना, त्रिपुरी संकट में सुभाषचंद्र बोस के खिलाफ हठी रुख अपनाना, द्वितीय विश्व युद्ध के समय हिटलर को लेकर अव्यावहारिक अहिंसा की बातें करना और नोआखली के दौर में ब्रह्मचर्य के अजीबोगरीब प्रयोग,
ये सभी उनके जीवन की गंभीर ऐतिहासिक गलतियां और व्यक्तिगत अपवाद हैं, जिनकी आलोचना बिना किसी कानूनी या वैचारिक डर के की जानी चाहिए।
लेकिन इसके साथ ही, उनके खिलाफ फैलाए गए इस झूठ को खारिज करना भी उतना ही आवश्यक है कि वे विभाजन के साजिशकर्ता थे या उन्होंने भगत सिंह की बलि चढ़ने दी।
गांधी की सबसे बड़ी ताकत उनका दुस्साहसिक सच और पूर्ण पारदर्शिता थी। उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम ‘सत्य के प्रयोग’ रखा, जहाँ उन्होंने अपनी कामुकता, अपनी गलतियों और अपनी कमजोरियों को दुनिया के सामने बिना किसी शर्म के दर्ज किया।
आज के दौर में जब राजनेता अपनी एक छोटी सी गलती को छुपाने के लिए इतिहास की किताबों को बदल देते हैं और जनसंपर्क (PR) एजेंसियों के पीछे छुपते हैं, गांधी ने अपना पूरा जीवन एक खुली किताब की तरह देश के सामने रख दिया था।
गांधी को देवता बनाकर पूजना उनके विचारों की हत्या करने जैसा है, और उन्हें खलनायक बनाना इतिहास के साथ बेईमानी है।
गांधी एक ऐसे हाड़-मांस के नेता थे, जिनकी गलतियों से सबक लिया जाना चाहिए और जिनकी चेतना को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाकर रखा जाना चाहिए।